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Rigveda / 7 / 56 / 15

यदि॑ स्तु॒तस्य॑ मरुतो अधी॒थेत्था विप्र॑स्य वा॒जिनो॒ हवी॑मन्। म॒क्षू रा॒यः सु॒वीर्य॑स्य दात॒ नू चि॒द्यम॒न्य आ॒दभ॒दरा॑वा ॥१५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 56 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वे मनुष्य कैसे प्रसिद्ध हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यदि॑। स्तु॒तस्य॑। म॒रु॒तः॒। अ॒धि॒ऽइ॒थ। इ॒त्था। विप्र॑स्य। वा॒जिनः॑। हवी॑मन्। म॒क्षु। रा॒यः। सु॒ऽवीर्य॑स्य। दा॒त॒। नु। चि॒त्। यम्। अ॒न्यः। आ॒ऽदभ॑त्। अरा॑वा ॥१५॥

पदार्थ : हे (मरुतः) पवनों के समान वर्त्तमान मनुष्यो ! (यदि) यदि (स्तुतस्य) प्रशंसित (वाजिनः) वेगयुक्त (विप्रस्य) मेधावी जन के (हवीमन्) जिस में देने योग्य वस्तु विद्यमान उस व्यवहार में (इत्था) इस प्रकार से (मक्षू) शीघ्र (अधीथ) स्मरण करो (सुवीर्यस्य) और जिन के सम्बन्ध में शुभ वीर्य होता उस (रायः) धन को (दात) देओ (चित्) और (यम्) जिसको (अन्यः) अन्य (अरावा) न देनेवाला जन (नु) शीघ्र (आदभत्) नष्ट करें तो क्या-क्या विचार न हो ॥१५॥

भावार्थ : जो विद्वान् के समीप से पढ़ते हैं, वे समर्थ अर्थात् विद्यासम्पन्न हो धनपति होते हैं ॥१५॥