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Rigveda / 7 / 56 / 18

आ वो॒ होता॑ जोहवीति स॒त्तः स॒त्राचीं॑ रा॒तिं म॑रुतो गृणा॒नः। य ईव॑तो वृषणो॒ अस्ति॑ गो॒पाः सो अद्व॑यावी हवते व उ॒क्थैः ॥१८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 56 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वे राजजन कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। वः॒। होता॑। जो॒ह॒वी॒ति॒। स॒त्तः। स॒त्राची॑। रा॒तिम्। म॒रु॒तः॒। गृ॒णा॒नः। यः। ईव॑तः। वृ॒ष॒णः॒। अस्ति॑। गो॒पाः। सः। अद्व॑यावी। ह॒व॒ते॒। वः॒। उ॒क्थैः ॥१८॥

पदार्थ : हे (मरुतः) पवनों के तुल्य मनुष्यो ! (यः) जो (गृणानः) स्तुति करता (सत्तः) बैठा हुआ (अद्वयावी) छल-कपट आदि से रहित (होता) देनेवाला (ईवतः) जाते हुए (वृषणः) वर्षा करनेवाले के सम्बन्ध में (वः) तुम लोगों को (आ, जोहवीति) निरन्तर बुलाता (सत्राचीम्) जो सत्य को देती है उस (रातिम्) दान को देता और (गोपाः) रक्षा करनेवाला (अस्ति) है तथा (उक्थैः) कहने योग्य वचनों से (वः) तुम लोगों को (हवते) बुलाता है, वह उत्तम है, इस को जानो ॥१८॥

भावार्थ : जो राजा आदि जन अभय देने और सब की रक्षा करनेवाला, छलकपट आदि दोषरहित, सत्यविद्या दाता और सत्यग्राहक है, वही यहाँ प्रशंसित वर्त्तमान है, उसी को मनुष्य उत्तम जानें ॥१८॥