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Rigveda / 7 / 57 / 1

मध्वो॑ वो॒ नाम॒ मारु॑तं यजत्राः॒ प्र य॒ज्ञेषु॒ शव॑सा मदन्ति। ये रे॒जय॑न्ति॒ रोद॑सी चिदु॒र्वी पिन्व॒न्त्युत्सं॒ यदया॑सुरु॒ग्राः ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 57 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य किसके सदृश क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : मध्वः॑। वः॒। नाम॑। मारु॑तम्। य॒ज॒त्राः॒। प्र। य॒ज्ञेषु॑। शव॑सा। म॒द॒न्ति॒। ये। रे॒जय॑न्ति। रोद॑सी॒ इति॑। चि॒त्। उ॒र्वी इति॑। पिन्व॑न्ति। उत्स॑म्। यत्। अया॑सुः। उ॒ग्राः ॥१॥

पदार्थ : हे (यजत्राः) मिलनेवाले ! (ये) जो (उग्राः) तेजस्वी बिजुली के सहित पवन (यत्) जो (उर्वी) बहुत पदार्थों से युक्त (रोदसी) अन्तरिक्ष पृथिवी और (उत्सम्) कूप को जैसे वैसे सम्पूर्ण संसार को (पिन्वन्ति) सींचते हैं और (चित्) भी (रेजयन्ति) कम्पाते हैं (अयासुः) प्राप्त होवें उसको (ये) जो (वः) आप लोगों को (मध्वः) मानते हुए (नाम) प्रसिद्ध (यज्ञेषु) विद्वानों के सत्कार आदिकों में (शवसा) बल से (मारुतम्) मनुष्यों के कर्म की (प्र, मदन्ति) कामना करते हैं, उनको आप लोग जानिये ॥१॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पवन, भूगोलों को घुमाते और धारण करते हैं और वृष्टियों से सीचते हैं, उनको जान कर विद्वान् जन कार्यों को कर के आनन्द करें ॥१॥