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Rigveda / 7 / 59 / 7

स॒स्वश्चि॒द्धि त॒न्वः१॒॑ शुम्भ॑माना॒ आ हं॒सासो॒ नील॑पृष्ठा अपप्तन्। विश्वं॒ शर्धो॑ अ॒भितो॑ मा॒ नि षे॑द॒ नरो॒ न र॒ण्वाः सव॑ने॒ मद॑न्तः ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 59 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य किसके सदृश किसको जानें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : स॒स्वरिति॑। चि॒त्। हि। त॒न्वः॑। शुम्भ॑मानाः। आ। हं॒सासः॑। नील॑ऽपृष्ठाः। अ॒प॒प्त॒न्। विश्व॑म्। शर्धः॑। अ॒भितः॑। मा॒। नि। से॒द॒। नरः॑। न। र॒ण्वाः। सव॑ने। मद॑न्तः ॥७॥

पदार्थ : हे विद्वान् जनो ! जैसे (शुम्भमानाः) शोभते हुए (हि) ही (हंसासः) हंसों के समान गमन करनेवाले (नीलपृष्ठाः) शुद्ध कारण जिनके वे (सस्वः) छिपे हुए (चित्) निश्चित (तन्वः) विस्तारयुक्त प्राण देह आदि में (आ) सब ओर से (अपप्तन्) गिरते हैं, वैसे (सवने) ऐश्वर्य्य में (मदन्तः) आनन्द करते हुए (रण्वाः) सुन्दर (नरः) अग्रणी जनों के (न) समान (मा) मुझ को (अमितः) सब ओर से आप लोग (नि, सेद) बैठाइये और (विश्वम्) सम्पूर्ण (शर्धः) बल को प्राप्त कराइये ॥७॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे हंस पक्षी शीघ्र चलते हैं, वैसे देह से प्राण निकलते हैं और जैसे उत्तम मनुष्य सब के प्रिय होते हैं, वैसे ही विद्वान् जन सब के प्रिय होते हैं ॥७॥