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Rigveda / 1 / 48 / 2

अश्वा॑वती॒र्गोम॑तीर्विश्वसु॒विदो॒ भूरि॑ च्यवन्त॒ वस्त॑वे । उदी॑रय॒ प्रति॑ मा सू॒नृता॑ उष॒श्चोद॒ राधो॑ म॒घोना॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 48 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : उषाः | छन्द : निचृत्सतः पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह कैसी और क्या करती है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : अश्व॑ऽवतीः । गोऽम॑तीः । वि॒श्व॒ऽसु॒विदः॑ । भूरि॑ । च्य॒व॒न्त॒ । वस्त॑वे । उत् । ई॒र॒य॒ । प्रति॑ । मा॒ । सू॒नृताः॑ । उ॒षः॒ । चो॒द॒ । राधः॑ । म॒घोना॑म्॥

पदार्थ : हे (उषः) उषा के सदृश स्त्री ! तू जैसे यह शुभगुणयुक्ता उषा है वैसे (अश्वावतीः) प्रशंसनीय व्याप्ति युक्त (गोमतीः) बहुत गौ आदि पशु सहित (विश्वसुविदः) सब वस्तुओं को अच्छे प्रकार जाननेवाली (सूनृताः) अच्छे प्रकार प्रियादियुक्त वाणियों को (वस्तवे) सुख में निवास के लिये (भूरि) बहुत (उदीरय) प्रेरणा कर और जो व्यवहारों से (च्यवन्त) निवृत्त होते हैं उनको (मघोनाम्) धनवानों के सकाश से (राधः) उत्तम से उत्तम धन को (चोद) प्रेरणा कर उनसे (मा) मुझे (प्रति) आनन्दित कर ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे अच्छी शोभित उषा सब प्राणियों को सुख देती है वैसे स्त्रियां अपने पतियों को निरन्तर सुख दिया करें ॥२॥