Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 48 / 4

उषो॒ ये ते॒ प्र यामे॑षु यु॒ञ्जते॒ मनो॑ दा॒नाय॑ सू॒रयः॑ । अत्राह॒ तत्कण्व॑ एषां॒ कण्व॑तमो॒ नाम॑ गृणाति नृ॒णाम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 48 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : उषाः | छन्द : विराट्सतःपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : जो प्रभात समय में योगाऽभ्यास करते हैं, वे किसको प्राप्त होते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : उषः॑ । ये । ते॒ । प्र । यामे॑षु । यु॒ञ्जते॑ । मनः॑ । दा॒नाय॑ । सू॒रयः॑ । अत्र॑ । अह॑ । तत् । कण्वः॑ । ए॒षा॒म् । कण्व॑ऽतमः । नाम॑ । गृ॒णा॒ति॒ । नृ॒णाम्॥

पदार्थ : हे विद्वन् जो (सूरयः) स्तुति करनेवाले विद्वान् लोग ! (ते) आपसे उपदेश पाके (अत्र) इस (उषः) प्रभात के (यामेषु) प्रहरों में (दानाय) विद्यादि दान के लिये (मनः) विज्ञान युक्त चित्त को (प्रयुंजते) प्रयुक्त करते हैं वे जीवन्मुक्त होते हैं और जो (कण्वः) मेधावी (एषाम्) इन (नृणाम्) प्रधान विद्वानों के (नाम) नामों को (गृणाति) प्रशंसित करता है वह (कण्वतमः) अतिशय मेधावी होता है ॥४॥

भावार्थ : जो मनुष्य एकान्त पवित्र निरुपद्रव देश में स्थिर होकर यमादि संयमान्त उपासना के नव अंगों का अभ्यास करते हैं वे निर्मल आत्मा होकर ज्ञानी श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं और जो इनका संग और सेवा करते हैं वे भी शुद्ध अन्तःकरण होके आत्मयोग के जानने के अधिकारी होते हैं ॥४॥