Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 48 / 11

उषो॒ वाजं॒ हि वंस्व॒ यश्चि॒त्रो मानु॑षे॒ जने॑ । तेना व॑ह सु॒कृतो॑ अध्व॒राँ उप॒ ये त्वा॑ गृ॒णन्ति॒ वह्न॑यः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 48 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : उषाः | छन्द : निचृत्पथ्याबृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर वे कैसी है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : उषः॑ । वाज॑म् । हि । वंस्व॑ । यः । चि॒त्रः । मानु॑षे । जने॑ । तेन॑ । आ । व॒ह॒ । सु॒ऽकृतः॑ । अ॒ध्व॒रान् । उप॑ । ये । त्वा॒ । गृ॒णन्ति॑ । वह्न॑यः॥

पदार्थ : हे (उषः) प्रभात वेला के तुल्य वर्त्तमान स्त्री ! तू (यः) जो (चित्रः) अद्भुत गुण कर्म स्वभावयुक्त (सुकृतः) उत्तम क्रम करनेवाला तेरा पति है (मानुषे) मनुष्य (जने) विद्याधर्मादि गुणों से प्रसिद्ध में (वाजम्) ज्ञान वा अन्न को (हि) निश्चय करके (वंस्व) सम्यक् प्रकार से सेवन कर (ये) जो (वह्नयः) प्राप्ति करनेवाले विद्वान् मनुष्य जिस कारण से (अध्वरान्) अध्वर यज्ञ वा अहिंसनीय विद्वानों की (उपगृणन्ति) अच्छे प्रकार स्तुति करते और तुझ को उपदेश करते हैं (तेन) उससे उनको (आवाह) सुखों को प्राप्त कराती रहे ॥११॥

भावार्थ : जो मनुष्य जैसे सूर्य्य उषा को प्राप्त होके दिन को #कर सबको सुख देता है वैसे अपनी स्त्रियों को भूषित करते हैं उनको स्त्री-जन भी भूषित करती हैं इस प्रकार परस्पर प्रीति उपकार से सदा सुखी रहें ॥११॥ #[अर्थात् ‘प्रकटकर’। सं०]