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Rigveda / 1 / 48 / 16

सं नो॑ रा॒या बृ॑ह॒ता वि॒श्वपे॑शसा मिमि॒क्ष्वा समिळा॑भि॒रा । सं द्यु॒म्नेन॑ विश्व॒तुरो॑षो महि॒ सं वाजै॑र्वाजिनीवति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 48 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : उषाः | छन्द : निचृत्सतः पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह किससे क्या दे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : सम् । नः॒ । रा॒या । बृ॒ह॒ता । वि॒श्वऽपे॑शसा । मि॒मि॒क्ष्व । सम् । इळा॑भिः । आ । सम् । द्यु॒म्नेन॑ । वि॒श्व॒ऽतुरा॑ । उ॒षः॒ । म॒हि॒ । सम् । वाजैः॑ । वा॒जि॒नी॒ऽव॒ति॒॥

पदार्थ : हे (उषः) प्रातः समय के सम तुल्य वर्त्तमान (वाजिनीवति) प्रशंसनीय क्रियायुक्त (महि) पूजनीय विद्वान् स्त्री ! तू जैसे (उषाः) सब रूप को प्रकाश करनेवाली प्रातःसमय की वेला (विश्वपेशसा) सब सुन्दर रूप युक्त (बृहता) बड़े (विश्वतुरा) सबको प्रवृत्त करने (संद्युम्नेन) विद्या धर्मादि गुण प्रकाश युक्त (राया) प्रशंसनीय धन (सामिड़ाभिः) भूमि वाणी नीति और (संवाजैः) अच्छे प्रकार युद्ध अन्न विज्ञान से (नः) हम लोगों को सुख देती है वैसे ही इन से तू हमे सुख दे ॥१६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे विद्वानों की विद्या शिक्षा से उषा के गुण का ज्ञान होके उससे पुरुषार्थ सिद्धि फिर उससे सब सुखों की निमित्त विद्या प्राप्त होती है वैसे ही माता की शिक्षा से पुत्र उत्तम होते है और प्रकार से नहीं ॥१६॥ इस सूक्त में उषा के दृष्टान्त करके कन्या और स्त्रियों के लक्षणों का प्रतिपदान करने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह अड़तालीसवां सूक्त ४८ और पांचवां वर्ग ५ समाप्त हुआ ॥