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Rigveda / 1 / 51 / 11

मन्दि॑ष्ट॒ यदु॒शने॑ का॒व्ये सचाँ॒ इन्द्रो॑ व॒ङ्कू व॑ङ्कु॒तराधि॑ तिष्ठति। उ॒ग्रो य॒यिं निर॒पः स्रोत॑सासृज॒द्वि शुष्ण॑स्य दृंहि॒ता ऐ॑रय॒त्पुरः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 51 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : मन्दि॑ष्ट॑। यत्। उ॒शने॑। का॒व्ये। सचा॑। इन्द्रः॑। व॒ङ्कू इति॑। व॒ङ्कु॒ऽतरा। अधि॑। ति॒ष्ठ॒ति॒। उ॒ग्रः। य॒यिम्। निः। अ॒पः। स्रोत॑सा। अ॒सृ॒ज॒त्। वि। शुष्ण॑स्य। दृं॒हि॒ताः। ऐ॒र॒य॒त्। पुरः॑ ॥

पदार्थ : हे (मन्दिष्ट) अतिशय करके स्तुति करनेवाले जो (उग्रः) दुष्टों को मारनेवाले (इन्द्रः) सभाध्यक्ष ! आप जैसे सूर्य (स्रोतसा) स्रोतों से (आपः) जलों को बहाता है, वैसे (उशने) अतीव सुन्दर (यत्) जिस (काव्ये) कवियों के कर्म में जो (वङ्कू) कुटिल (वङ्कुतरा) अतिशय करके कुटिल चालवाले शत्रु और उदासी मनुष्यों के (अधितिष्ठति) राज्य में अधिष्ठाता होते हो जैसे सविता (सचा) अपने गुणों से (ययिम्) मेघ को (निरसृजत्) नित्य सर्जन करता है, वैसे (शुष्णस्य) बल की (दृंहिता) वृद्धि कराने हारी क्रियाओं को (पुरः) पहिले (व्यैरयत्) प्राप्त करते हो, सो आप सत्कार करने योग्य हो ॥ ११ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जो कवि सब शास्त्र का वक्ता, कुटिलता का विनाश करने, दुष्टों में कठोर, श्रेष्ठों में कोमल, सर्वथा बल को बढ़ानेवाला पुरुष है, उसी को सभा आदि के अधिकारों में स्वीकार करें ॥ ११ ॥