Rigveda / 1 / 52 / 4
आ यं पृ॒णन्ति॑ दि॒वि सद्म॑बर्हिषः समु॒द्रं न सु॒भ्वः१॒॑ स्वा अ॒भिष्ट॑यः। तं वृ॑त्र॒हत्ये॒ अनु॑ तस्थुरू॒तयः॒ शुष्मा॒ इन्द्र॑मवा॒ता अह्रु॑तप्सवः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 52 | Mantra No : 4
In English:
Seer : savya aa~NgirasaH | Devta : indra: | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : aa ya.m pRRiNanti divi sadmabarhiShaH samudra.m na subhvaH1 svaa abhiShTayaH. ta.m vRRitrahatye anu tasthuruutayaH shuShmaa indramavaataa ahrutapsavaH .
Component Words : aa. yam. pRRiNanti. divi. sadma.abarhiShaH. samudram. na. su.abhvaH. svaaH. abhiShTayaH. tam. vRRitra.ahatye. anu. tasthuH. uutayaH. shuShmaaH. indram. avaataaH. ahruta.apsavaH .
In Hindi:
ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
पदपाठ : आ। यम्। पृ॒णन्ति॑। दि॒वि। सद्म॑ऽबर्हिषः। स॒मु॒द्रम्। न। सु॒ऽभ्वः॑। स्वाः। अ॒भिष्ट॑यः। तम्। वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑। अनु॑। त॒स्थुः॒। ऊ॒तयः॑। शुष्माः॑। इन्द्र॑म्। अ॒वा॒ताः। अह्रु॑तऽप्सवः ॥
पदार्थ : (सद्मबर्हिषः) उत्तम स्थान आसनयुक्त (सुभ्वः) उत्तम होनेवाले मनुष्य (अवाताः) वायु के चलाने से रहित नदियाँ (समुद्रं न) जैसे सागर वा आकाश को प्राप्त होकर स्थित होती हैं, वैसे जिस (इन्द्रम्) सभासदों सहित सभापति को (वृत्रहत्ये) जिनमें मेघावयवों के हनन तुल्य हनन होता, उस संग्राम में (स्वाः) अपने (अभिष्टयः) शुभेच्छायुक्त (शुष्माः) बलसहित (अह्रुतप्सवः) कुटिलतारहित सूर्यरूप (ऊतयः) सुरिक्षत प्रजा (आ पृणन्ति) सुखी करें (तम्) उस परमैश्वर्यकारक वीरपुरुष के (अनुतस्थुः) अनुकूल स्थिर होवें, वही चक्रवर्त्ती राज्य करने को योग्य होता है ॥ ४ ॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे नदी समुद्र वा अन्तरिक्ष को प्राप्त होकर स्थिर होती है, वैसे ही सभासदों के सहित विद्वान् को प्राप्त होकर सब प्रजा स्थिर सुखवाली होती हैं ॥ ४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥
पदपाठ : आ। यम्। पृ॒णन्ति॑। दि॒वि। सद्म॑ऽबर्हिषः। स॒मु॒द्रम्। न। सु॒ऽभ्वः॑। स्वाः। अ॒भिष्ट॑यः। तम्। वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑। अनु॑। त॒स्थुः॒। ऊ॒तयः॑। शुष्माः॑। इन्द्र॑म्। अ॒वा॒ताः। अह्रु॑तऽप्सवः ॥
पदार्थ : (आ) समन्तात् (यम्) सभाध्यक्षम् (पृणन्ति) सुखयेयुः (दिवि) न्यायप्रकाशे (सद्मबर्हिषः) सद्मस्थानं बर्हिरुत्तमं यासां ताः (समुद्रम्) सागरम् (न) इव (सुभ्वः) याः सुष्ठु भवन्ति ताः (स्वाः) स्वकीयाः (अभिष्टयः) इष्टेच्छाः (तम्) पूर्वोक्तम् (वृत्रहत्ये) वृत्राणां मेघाऽवयवानां हत्या हननमिव यस्मिँस्तस्मिन् संग्रामे (अनु) आनुपूर्व्ये (तस्थुः) वर्त्तन्ते (ऊतयः) रक्षणाद्याः (शुष्माः) बलवत्यः शोषणकारिण्यो वा (इन्द्रम्) परमैश्वर्य्यहेतुं सूर्य्यम् (अवाताः) अविद्यमानो वायुः कम्पनं यासां तां (अह्रुतप्सवः) अह्रुतं कुटिलं सूर्य्यरूपं यासां ताः। अत्र ह्रु ह्वरेश्छन्दसि। (अष्टा०७.२.३१) अनेन ह्रुरादेशः। प्स्विति रूपनामसु पठितम्। (निघं०३.७) ॥ ४ ॥
अन्वय : सद्मबर्हिषो मनुष्या अवाता नद्यः सुभ्वो समुद्रं न यमिन्द्रं वृत्रहत्ये स्वा अभिष्टयः शुष्मा अह्रुतप्सव ऊतयः प्रजा आपृणन्ति तमनुतस्थुरनुतिष्ठेयुः स एव साम्राज्यं कर्त्तुमर्हति ॥ ४ ॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः। यथा सरितः समुद्रं जलमयमन्तरिक्षं वा प्राप्य स्थिरा भवन्ति, तथैव ससभं विद्वांसं प्राप्य सर्वाः प्रजाः स्थिरसुखा जायन्ते ॥ ४ ॥