Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 52 / 12

त्वम॒स्य पा॒रे रज॑सो॒ व्यो॑मनः॒ स्वभू॑त्योजा॒ अव॑से धृषन्मनः। च॒कृ॒षे भूमिं॑ प्रति॒मान॒मोज॑सो॒ऽपः स्वः॑ परि॒भूरे॒ष्या दिव॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 52 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर इस समग्र जगत् का राजा परमात्मा कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : त्वम्। अ॒स्य। पा॒रे। रज॑सः। विऽओ॑मनः। स्वभू॑तिऽओजाः। अव॑से। धृ॒ष॒त्ऽम॒नः॒। च॒कृ॒षे। भूमि॑म्। प्र॒ति॒ऽमान॑म्। ओज॑सः। अ॒पः। स्व१॒॑रिति॑ स्वः॑। प॒रि॒ऽभूः। ए॒षि॒। आ। दिव॑म् ॥

पदार्थ : हे (धृषन्मनः) अनन्त प्रगल्भ विज्ञानयुक्त जगदीश्वर ! जो (परिभूः) सब प्रकार होने (स्वभूत्योजाः) अपने ऐश्वर्य वा पराक्रम से युक्त (त्वम्) आप (अवसे) रक्षा आदि के लिये (अस्य) इस संसार के (रजसः) पृथिवी आदि लोकों तथा (व्योमनः) आकाश के (पारे) अपरभाग में भी (एषि) प्राप्त हैं और आप (ओजसः) पराक्रम आदि के (प्रतिमानम्) अवधि (स्वः) सुख (दिवम्) शुद्ध विज्ञान के प्रकाश (भूमिम्) भूमि और (अपः) जलों को (आचकृषे) अच्छे प्रकार स्थित किया है, उन आपकी हम सब लोग उपासना करते हैं ॥ १२ ॥

भावार्थ : जैसे परमेश्वर सब से उत्तम, सबसे परे वर्त्तमान होकर सामर्थ्य से लोकों को रच के, उनमें सब प्रकार से व्याप्त हो धारण कर सब को व्यवस्था में युक्त करता हुआ जीवों के पाप-पुण्य की व्यवस्था करने से न्यायाधीश होकर वर्त्तता है, वैसे ही न्यायाधीश भी सब भूमि के राज्य को सम्पादन करता हुआ, सबके लिये सुखों को उत्पन्न करे ॥ १२ ॥