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Rigveda / 1 / 52 / 14

न यस्य॒ द्यावा॑पृथि॒वी अनु॒ व्यचो॒ न सिन्ध॑वो॒ रज॑सो॒ अन्त॑मान॒शुः। नोत स्ववृ॑ष्टिं॒ मदे॑ अस्य॒ युध्य॑त॒ एको॑ अ॒न्यच्च॑कृषे॒ विश्व॑मानु॒षक् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 52 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : न। यस्य॑। द्यावा॑पृथि॒वी इति॑। अनु॑। व्यचः॑। न। सिन्ध॑वः। रज॑सः। अन्त॑म्। आ॒न॒शुः। न। उ॒त। स्वऽवृ॑ष्टिम्। मदे॑। अ॒स्य॒। युध्य॑तः। एकः॑। अ॒न्यत्। च॒कृ॒षे॒। विश्व॑म्। आ॒नु॒षक् ॥

पदार्थ : (यस्य) जिस (रजसः) ऐश्वर्ययुक्त जगदीश्वर की (अनुव्यचः) अनन्तव्याप्ति के अनुकूल वर्त्तमान (द्यावापृथिवी) प्रकाश अप्रकाश युक्त लोक और चन्द्रमादि भी (अन्तम्) अन्त अर्थात् सीमा को (न) नहीं (आनशुः) प्राप्त होते हैं, हे परमात्मन् ! जैसे (स्ववृष्टिम्) अपने पदार्थों की रक्षा के प्रति (मदे) आनन्द में (युध्यतः) युद्ध करते हुए मेघ का सूर्य के सामने विजय नहीं होता, वैसे (एकः) सहायरहित अद्वितीय जगदीश्वर ने (अन्यत्) अपने से भिन्न द्वितीय (विश्वम्) जगत् को (आनुषक्) अपनी व्याप्ति से युक्त किया है, इससे आप उपासना के योग्य हैं ॥ १४ ॥

भावार्थ : जैसे परमेश्वर के किसी गुण की कोई मनुष्य वा कोई लोक सीमा को ग्रहण नहीं कर सकता और जैसे वह पापयुक्त कर्म करनेवाले मनुष्यों के लिये दुःखरूप फल देने से पीड़ा देता दुष्टों की ताड़ना करता और सूर्य मेघाऽवयवों को विदारण करता और युद्ध करनेवाले मनुष्य के समान वर्त्तता है, वैसे ही सब सज्जन मनुष्यों को वर्त्तना चाहिये ॥ १४ ॥