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Rigveda / 1 / 55 / 4

स इद्वने॑ नम॒स्युभि॑र्वचस्यते॒ चारु॒ जने॑षु प्रब्रुवा॒ण इ॑न्द्रि॒यम्। वृषा॒ छन्दु॑र्भवति हर्य॒तो वृषा॒ क्षेमे॑ण॒ धेनां॑ म॒घवा॒ यदिन्व॑ति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 55 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वह कैसा कर्म करे, यह उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : सः। इत्। वने॑। न॒म॒स्युऽभिः॑। व॒च॒स्य॒ते॒। चारु॑। जने॑षु। प्र॒ऽब्रु॒वा॒णः। इ॒न्द्रि॒यम्। वृषा॑। छन्दुः॑। भ॒व॒ति॒। ह॒र्य॒तः। वृषा॑। क्षेमे॑ण। धेना॑म्। म॒घवा॑। यत्। इन्व॑ति ॥

पदार्थ : (यत्) जो अध्यापक वा उपदेशकर्त्ता (वने) एकान्त में एकाग्र चित्त से (जनेषु) प्रसिद्ध मनुष्यों में (चारु) सुन्दर (इन्द्रियम्) मन को (ब्रुवाणः) अच्छे प्रकार कहता (हर्य्यतः) और सबको उत्तम बोध की कामना करता हुआ (प्रभवति) समर्थ होता है (वृषा) दृढ़ (मघवा) प्रशंसित विद्या और धनवाला (छन्दुः) स्वच्छन्द (वृषा) सुख वर्षानेवाला (क्षेमेण) रक्षण के सहित (धेनाम्) विद्या शिक्षायुक्त वाणी को (इन्वति) व्याप्त करता है (स इत्) वही (नमस्युभिः) नम्र विद्वानों से (वचस्यते) प्रशंसा को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥

भावार्थ : उत्तम विद्वान् सभाध्यक्ष सब मनुष्यों के लिये सब विद्याओं को प्राप्त करके सबको विद्यायुक्त, बहुश्रुत, रक्षा वा स्वच्छन्दतायुक्त करें कि जिससे सब निस्सन्देह होकर सदा सुखी रहें ॥ ४ ॥