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Rigveda / 1 / 56 / 3

स तु॒र्वणि॑र्म॒हाँ अ॑रे॒णु पौंस्ये॑ गि॒रेर्भृ॒ष्टिर्न भ्रा॑जते तु॒जा शवः॑। येन॒ शुष्णं॑ मा॒यिन॑माय॒सो मदे॑ दु॒ध्र आ॒भूषु॑ रा॒मय॒न्नि दाम॑नि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 56 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वे दोनों कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : सः। तु॒र्वणिः॑। म॒हान्। अ॒रे॒णु। पौंस्ये॑। गि॒रेः। भृ॒ष्टिः। न। भ्रा॒ज॒ते॒। तु॒जा। शवः॑। येन॑। शुष्ण॑म्। मा॒यिन॑म्। आ॒य॒सः। मदे॑। दु॒ध्रः। आ॒भूषु॑। रा॒मय॑त्। नि। दाम॑नि ॥

पदार्थ : हे उत्तम वर की इच्छा करनेहारी कन्या ! जैसे तू जो (तुर्वणिः) शीघ्र सुखकारी (दुध्रः) बल से पूर्ण (आयसः) विज्ञान से युक्त (महान्) सर्वोत्कृष्ट (पौंस्ये) पुरुषार्थयुक्त व्यवहार में प्रवीण (तुजा) दुःखों का नाशक (आभूषु) सब प्रकार सबको सुभूषितकारक (अरेणु) क्षयरहित कर्म को (मदे) हर्षित होने में (रमयत्) क्रीड़ा का हेतु (शवः) उत्तम बल को प्राप्त हो के (न) जैसे (गिरेः) मेघ के (भृष्टिः) उत्तम शिखर (भ्राजते) प्रकाशित होते हैं, वैसे (तम्) उस (शुष्णम्) बलयुक्त (मायिनम्) अत्युत्तम बुद्धिमान् वर को (येन) जिस बल से (दामनि) सुखदायक गृहाश्रम में स्वीकार करती हो, वैसे (सः) वह वर भी तुझे उसी बल से प्रेमबद्ध करे ॥ ३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। अति उत्तम विवाह वह है, जिसमें तुल्य रूप स्वभाव युक्त कन्या और वर का सम्बन्ध होवे, परन्तु कन्या से वर का बल और आयु दूना वा ड्योढ़ा होना चाहिये ॥ ३ ॥