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Rigveda / 1 / 58 / 1

नू चि॑त्सहो॒जा अ॒मृतो॒ नि तु॑न्दते॒ होता॒ यद्दू॒तो अभ॑वद्वि॒वस्व॑तः। वि साधि॑ष्ठेभिः प॒थिभी॒ रजो॑ मम॒ आ दे॒वता॑ता ह॒विषा॑ विवासति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 58 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब अट्ठावनवें सूक्त का आरम्भ है। उस के पहिले मन्त्र में अग्नि के दृष्टान्त से जीव के गुणों का उपदेश किया है ॥

पदपाठ : नु। चि॒त्। स॒हः॒ऽजाः। अ॒मृतः॑। नि। तु॒न्दते॑। होता॑। यत्। दू॒तः। अभ॑वत्। वि॒वस्व॑तः। वि। साधि॑ष्ठेभिः। प॒थिऽभिः॑। रजः॑। म॒मे॒। आ। दे॒वऽता॑ता। ह॒विषा॑। वि॒वा॒स॒ति॒ ॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यत्) जो (चित्) विद्युत् के समान स्वप्रकाश (अमृतः) स्वस्वरूप से नाशरहित (सहोजाः) बल को उत्पादन करने हारा (होता) कर्मफल का भोक्ता सब मन और शरीर आदि का धर्त्ता (दूतः) सबको चलाने हारा (अभवत्) होता है (देवताता) दिव्यपदार्थों के मध्य में दिव्यस्वरूप (साधिष्ठेभिः) अधिष्ठानों से सह वर्त्तमान (पथिभिः) मार्गों से (रजः) पृथिवी आदि लोकों को (नु) शीघ्र बनाने हारे (विवस्वतः) स्वप्रकाश स्वरूप परमेश्वर के मध्य में वर्त्तमान होकर (हविषा) ग्रहण किये हुए शरीर से सहित (नि तुन्दते) निरन्तर जन्म-मरण आदि में पीड़ित होता और अपने कर्मों के फलों का (विवासति) सेवन और अपने कर्म में (व्याममे) सब प्रकार से वर्त्तता है, सो जीवात्मा है, ऐसा तुम लोग जानो ॥ १ ॥

भावार्थ : हे मनुष्य लोगो ! तुम अनादि अर्थात् उत्पत्तिरहित, सत्यस्वरूप, ज्ञानमय, आनन्दस्वरूप, सर्वशक्तिमान्, स्वप्रकाश, सबको धारण और सबके उत्पादक, देश-काल और वस्तुओं के परिच्छेद से रहित और सर्वत्र व्यापक परमेश्वर में नित्य व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध से जो अनादि, नित्य, चेतन, अल्प, एकदेशस्थ और अल्पज्ञ है, वही जीव है, ऐसा निश्चित जानो ॥ १ ॥