Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 58 / 5

तपु॑र्जम्भो॒ वन॒ आ वात॑चोदितो यू॒थे न सा॒ह्वाँ अव॑ वाति॒ वंस॑गः। अ॒भि॒व्रज॒न्नक्षि॑तं॒ पाज॑सा॒ रजः॑ स्था॒तुश्च॒रथं॑ भयते पत॒त्रिणः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 58 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : तपुः॑ऽजम्भः। वने॑। आ। वात॑ऽचोदितः। यू॒थे। न। सा॒ह्वान्। अव॑। वा॒ति॒। वंस॑गः। अ॒भि॒ऽव्रज॑न्। अक्षि॑तम्। पाज॑सा। रजः॑। स्था॒तुः। च॒रथ॑म्। भ॒य॒ते॒। प॒त॒त्रिणः॑ ॥

पदार्थ : हे मनुष्य लोगो ! जो (वंसगः) भिन्न-भिन्न पदार्थों को प्राप्त होता (वातचोदितः) प्राणों से प्रेरित (तपुर्जम्भः) जिस का मुख के समान प्रताप, वह जीव अग्नि के सदृश जैसे (यूथम्) सेना में (साह्वान्) सहनशील जीव (अववाति) सब शरीर की चेष्टा कराता है, जो विस्तृत होके दुःखों का हनन करता जो (अभिव्रजन्) जाता-आता हुआ (चरथम्) चरनेहारे (अक्षितम्) क्षयरहित (रजः) कारण के सहित लोकसमूह को (पाजसा) बल से धरता जो (स्थातुः) स्थिर वृक्ष में बैठे हुए (पतत्रिणः) पक्षी के समान (भयते) भय करता है, सो तुम्हारा आत्मस्वरूप है, इस प्रकार तुम लोग जानो ॥ ५ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को योग्य है कि जो अन्तःकरण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार, प्राण अर्थात् प्राणादि दशवायु इन्द्रिय अर्थात् श्रोत्रादि दश इन्द्रियों का प्रेरक, इन का धारक और नियन्ता, स्वामी, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान आदि गुणवाला है, वह इस देह में जीव है, ऐसा निश्चित जानो ॥ ५ ॥