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Rigveda / 1 / 61 / 6

अ॒स्मा इदु॒ त्वष्टा॑ तक्ष॒द्वज्रं॒ स्वप॑स्तमं स्व॒र्यं१॒॑ रणा॑य। वृ॒त्रस्य॑ चिद्वि॒दद्येन॒ मर्म॑ तु॒जन्नीशा॑नस्तुज॒ता कि॑ये॒धाः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 61 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : अ॒स्मै। इत्। ऊँ॒ इति॑। त्वष्टा॑। त॒क्ष॒त्। वज्र॑म्। स्वपः॑ऽतमम्। स्व॒र्य॑म्। रणा॑य। वृ॒त्रस्य॑। चि॒त्। वि॒दत्। येन॑। मर्म॑। तु॒जन्। ईशा॑नः। तु॒ज॒ता। कि॒ये॒धाः ॥

पदार्थ : मनुष्यों को उचित है कि जो (त्वष्टा) प्रकाश करने (ईशानः) समर्थ (कियेधाः) कितनों को धारण करनेवाला शत्रुओं को (तुजन्) मारता हुआ (वृत्रस्य) मेघ के ऊपर अपने किरणों को छोड़ता (विदत्) प्राप्त होते हुए सूर्य के समान (स्वर्यम्) सुख के हेतु (स्वपस्तमम्) अतिशय करके उत्तम कर्मों के उत्पन्न करनेवाले (वज्रम्) किरणसमूह को (तक्षत्) छेदन करते हुए सूर्य के (चित्) समान (अस्मै) इस (रणाय) सङ्ग्राम के वास्ते जिस (मर्म) जीवननिमित्त स्थान को (तुजता) काटते हुए (येन) जिस वज्र से शत्रुओं को जीतता है, (इदु) उसी को सभा आदि का अध्यक्ष करना चाहिये ॥ ६ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अपने प्रताप से मेघ को छिन्न-भिन्न कर भूमि में जल को गिरा के सबको सुखी करता है, वैसे ही सभा आदि का अध्यक्ष विद्या, विनय वा शस्त्र-अस्त्रों के सीखने-सिखाने से युद्धों में कुशल सेना को सिद्ध कर, शत्रुओं को जीत कर, सब प्राणियों को आनन्दित किया करे ॥ ६ ॥