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Rigveda / 1 / 63 / 4

त्वं ह॒ त्यदि॑न्द्र चोदीः॒ सखा॑ वृ॒त्रं यद्व॑ज्रिन्वृषकर्मन्नु॒भ्नाः। यद्ध॑ शूर वृषमणः परा॒चैर्वि दस्यूँ॒र्योना॒वकृ॑तो वृथा॒षाट् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 63 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह पूर्वोक्त सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : त्वम्। ह॒। त्यत्। इ॒न्द्र॒। चो॒दीः॒। सखा॑। वृ॒त्रम्। यत्। व॒ज्रि॒न्। वृ॒ष॒ऽक॒र्म॒न्। उ॒भ्नाः। यत्। ह॒। शू॒र॒। वृ॒ष॒ऽम॒णः॒। प॒रा॒चैः। वि। दस्यू॑न्। योनौ॑। अकृ॑तः। वृ॒था॒षाट् ॥

पदार्थ : हे (वज्रिन्) उत्तम शस्त्रों के धारण करने तथा (इन्द्र) उत्तम गुणों के जाननेवाले सभाध्यक्ष ! जिस कारण (त्वम्) आप (ह) निश्चय करके (त्यत्) उस (वृत्रम्) शत्रु को (पराचैः) दूर (चोदीः) कर देते हो, इसी कारण श्रेष्ठ पुरुषों के धारण और पालन करने को समर्थ हो। हे (वृषकर्मन्) श्रेष्ठ मनुष्यों के समान उत्तम कर्मों के करनेवाले सभाध्यक्ष ! (यत्) जिस कारण आप (सखा) सबके मित्र हो, इसीसे मित्रों की रक्षा करते हो। हे (शूर) निर्भय सेनाध्यक्ष ! (यत्) जो आप (ह) निश्चय करके (दस्यून्) दूसरे के पदार्थों को छीन लेनेवाले दुष्टों को (अकृतः) दूर से (वि) विशेष कर के छेदन करते हो, इससे प्रजा की रक्षा करने के योग्य हो। हे (वृषमणः) शूरवीरों में विचारशील सभाध्यक्ष ! आप जिस कारण सुखों को (उभ्नाः) पूर्ण करते हो, इससे सत्कार करने के योग्य हो। तथा हे सभाध्यक्ष ! जिस कारण आप (वृथाषाट्) सहज स्वभाव से सहन करनेवाले हो, इससे (योनौ) घर में रहनेवाले सब मनुष्यों के सुखों को पूर्ण करते हो ॥ ४ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि जैसे सूर्य्य अपने प्रकाश से सबको आनन्दित कर तथा मेघ को उत्पन्न करके वर्षाता है और अन्धकार को निवारण करके अपने प्रकाश को फैलाता है, वैसे ही सभाध्यक्ष विद्यादि उत्तम गुणों से सबको सुखी, शरीर वा आत्मा के बल को सिद्ध, धर्म, शिक्षा, अभय आदि की वर्षा, अधर्मरूपी अन्धकार और शत्रुओं का निवारण करके राज्य में प्रकाशित होवे ॥ ४ ॥