Rigveda / 1 / 64 / 8
सिं॒हाइ॑व नानदति॒ प्रचे॑तसः पि॒शाइ॑व सु॒पिशो॑ वि॒श्ववे॑दसः। क्षपो॒ जिन्व॑न्तः॒ पृष॑तीभिर्ऋ॒ष्टिभिः॒ समित्स॒बाधः॒ शव॒साहि॑मन्यवः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 64 | Mantra No : 8
In English:
Seer : nodhaa gautamaH | Devta : indra: | Metre : jagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : si.mhaaiva naanadati prachetasaH pishaaiva supisho vishvavedasaH. kShapo jinvantaH pRRiShatiibhirRRiShTibhiH samitsabaadhaH shavasaahimanyavaH .
Component Words : si.mhaaH.aiva. naanadati. pra.achetasaH. pishaaH.aiva. su.apishaH. vishva.avedasaH. kShapaH. jinvantaH. pRRiShatiibhiH. RRIShTi.abhiH. sam. it. sa.abaadhaH. shavasaa. ahi.amanyavaH .
In Hindi:
ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय : फिर वे पूर्वोक्त वायु कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
पदपाठ : सिं॒हाःऽइ॑व। ना॒न॒द॒ति॒। प्रऽचे॑तसः। पि॒शाःऽइ॑व। सु॒ऽपिशः॑। वि॒श्वऽवे॑दसः। क्षपः॑। जिन्व॑न्तः। पृष॑तीभिः। ऋ॒ष्टिऽभिः॑। सम्। इत्। स॒ऽबाधः॒। शव॑सा। अहि॑ऽमन्यवः ॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! तुम लोग जो ये (प्रचेतसः) उत्तम विज्ञान होने के हेतु (सुपिशः) सुन्दर अवयवों के करनेवाले (सबाधः) पदार्थों को अपने नियम में रखनेवाले (अहिमन्यवः) मेघ की वर्षा का ज्ञान करानेवाले वायु (इत्) ही (ऋष्टिभिः) व्यवहारों के प्राप्त कराने और (पृषतीभिः) अपने गमनागमन वेगादिगुणों से (क्षपः) रात्रि को (संजिन्वन्तः) तृप्त करते हुए (विश्ववेदसः) सब कर्मों के प्राप्त करानेवाले पवन (शवसा) अपने बलों से (सिंहाइव) सिहों के समान तथा (पिशाइव) बड़े बलवाले हाथियों के समान (नानदति) अत्यन्त शब्द करते हैं, उनको कार्यों की सिद्धि के लिये यथावत् संयुक्त करो ॥ ८ ॥
भावार्थ : इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो ! तुम ऐसा जानो कि जितना बल, पराक्रम, जीवन, सुनना, विचारना आदि क्रिया है, वे सब वायु के सकाश से ही होती हैं ॥ ८ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय : पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते ॥
पदपाठ : सिं॒हाःऽइ॑व। ना॒न॒द॒ति॒। प्रऽचे॑तसः। पि॒शाःऽइ॑व। सु॒ऽपिशः॑। वि॒श्वऽवे॑दसः। क्षपः॑। जिन्व॑न्तः। पृष॑तीभिः। ऋ॒ष्टिऽभिः॑। सम्। इत्। स॒ऽबाधः॒। शव॑सा। अहि॑ऽमन्यवः ॥
पदार्थ : (सिंहाइव) व्याघ्रतुल्यबलाः (नानदति) पुनः पुनः शब्दयन्ति (प्रचेतसः) प्रकृष्टं चेतः संज्ञानं येभ्यस्ते (पिशाइव) यथा बलयुक्तावयववन्तो गजाः (सुपिशः) सुष्ठु पिशन्त्यवयुवन्ति ये ते (विश्ववेदसः) ये विश्वानि सर्वाणि कर्माणि वेदयन्ति प्रापयन्ति ते (क्षपः) रात्रीः। क्षपेति रात्रिनामसु पठितम्। (निघ०१.७) (जिन्वतः) तर्पयन्तः (पृषतीभिः) स्वगमनागमनवेगादिगुणैः (ऋष्टिभिः) व्यवहारप्रापकैः (सम्) सम्यगर्थे (इत्) एव (सबाधः) ये पदार्थान् सहैव बाधन्ते ते (शवसा) बलेन (अहिमन्यवः) येऽहिं मेघं मानयन्ति ते ज्ञापयन्ति ते ॥ ८ ॥
अन्वय : हे मनुष्या ! यूयं य एते प्रचेतसः सुपिशः सबाधोऽहिमन्यव इदेव ऋष्टिभिः पृषतीभिः क्षपः संजिन्वन्तो विश्ववेदसो वायवः शवसा सिंहा इव पिशा इव बलाऽवयववन्तो गजा इव नानदति तान् कार्य्येषु संप्रयोजयत ॥ ८ ॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारौ। हे मनुष्याः ! यूयं यावद्बलपराक्रमजीवनश्रवणमननादिकर्मास्ति तावत्सर्वं वायूनां सकाशादेव जायत इति विजानीत ॥ ८ ॥