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Rigveda / 1 / 64 / 12

घृषुं॑ पाव॒कं व॒निनं॒ विच॑र्षणिं रु॒द्रस्य॑ सू॒नुं ह॒वसा॑ गृणीमसि। र॒ज॒स्तुरं॑ त॒वसं॒ मारु॑तं ग॒णमृ॑जी॒षिणं॒ वृष॑णं सश्चत श्रि॒ये ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 64 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वायुओं के समुदाय कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : घृषु॑म्। पा॒व॒कम्। व॒निन॑म्। विऽच॑र्षणिम्। रु॒द्रस्य॑। सू॒नुम्। ह॒वसा॑। गृ॒णी॒म॒सि॒। र॒जः॒ऽतुर॑म्। त॒वस॑म्। मारु॑तम्। ग॒णम्। ऋ॒जी॒षिण॑म्। वृष॑णम्। स॒श्च॒त॒। श्रि॒ये ॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (हवसा) दान और ग्रहण से (श्रिये) विद्या, शिक्षा और चक्रवर्त्तिराज्य की प्राप्ति के लिये जिस (रुद्रस्य) मुख्य वायु के (सूनुम्) पुत्र के समान वर्त्तमान (विचर्षणिम्) भेद करने तथा (वनिनम्) संग्राम करनेवाले (घृषुम्) घिसने के स्वभाव से युक्त (पावकम्) पवित्र करनेवाले (तवसम्) महाबलवान् (रजस्तुरम्) लोकों को शीघ्र चलाने (ऋजीषिणम्) उत्तम शुद्धि होने के कारण और (वृषणम्) वृष्टि करनेवाले (मारुतम्) पवनों के (गणम्) समूह का (गृणीमसि) उपदेश करते हैं, उसको तुम भी (सश्चत) जानो ॥ १२ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि वायुसमुदाय के विना हमारे कोई काम सिद्ध नहीं हो सकते, ऐसी वायुविद्या का निश्चयतया स्वीकार करके अपने कार्यों की सिद्धि अवश्य करें ॥ १२ ॥