Rigveda / 1 / 64 / 15
नू ष्ठि॒रं म॑रुतो वी॒रव॑न्तमृती॒षाहं॑ र॒यिम॒स्मासु॑ धत्त। स॒ह॒स्रिणं॑ श॒तिनं॑ शूशु॒वांसं॑ प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 64 | Mantra No : 15
In English:
Seer : nodhaa gautamaH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : nuu ShThira.m maruto viiravantamRRitiiShaaha.m rayimasmaasu dhatta. sahasriNa.m shatina.m shuushuvaa.msa.m praatarmakShuu dhiyaavasurjagamyaat .
Component Words : nu. sthiram. marutaH. viira.avantam. RRIti.asaham. rayim. asmaasu. dhatta. sahasriNam. shatinam. shuushu.avaa.msam. praataH. makShu. dhiyaa.avasuH. jagamyaat .
In Hindi:
ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर वे उक्त वायु कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
पदपाठ : नु। स्थि॒रम्। म॒रु॒तः॒। वी॒रऽव॑न्तम्। ऋ॒ति॒ऽसह॑म्। र॒यिम्। अ॒स्मासु॑। ध॒त्त॒। स॒ह॒स्रिण॑म्। श॒तिन॑म्। शू॒शु॒ऽवांस॑म्। प्रा॒तः। म॒क्षु। धि॒याऽव॑सुः। ज॒ग॒म्या॒त् ॥
पदार्थ : हे (मरुतः) पवन के तुल्य वर्त्तमान ! जैसे विद्वान् लोग (अस्मासु) हम लोगों में (स्थिरम्) निश्चल (वीरवन्तम्) प्रशंसा करने योग्य वीर पुरुषों से युक्त (ऋतिषाहम्) सत्य के सहन करनेवाले (रयिम्) विद्याराज्य और सुवर्ण आदि धन को धारण करें और (धियावसुः) बुद्धि और कर्मों से युक्त विद्वान् (जगम्यात्) शीघ्र प्राप्त हों, वैसे उनको तुम (प्रातः) प्रतिदिन (मक्षु) शीघ्र (धत्त) धारण करो ॥ १५ ॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम लोग जैसे अति प्रशंसा करने योग्य, बुद्धिवाला, विद्या, पुरुषार्थों से युक्त विद्वान् जन वायु आदि पदार्थों के सकाश से दृढ़ निश्चल बहुत सुखों को सिद्ध करके आनन्द को प्राप्त होता है, वैसे तुम भी इस विद्या को प्राप्त होकर आनन्द भोगो ॥ १५ ॥ । इस सूक्त में वायु के गुणों का उपदेश करने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥
In Sanskrit:
ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते ॥
पदपाठ : नु। स्थि॒रम्। म॒रु॒तः॒। वी॒रऽव॑न्तम्। ऋ॒ति॒ऽसह॑म्। र॒यिम्। अ॒स्मासु॑। ध॒त्त॒। स॒ह॒स्रिण॑म्। श॒तिन॑म्। शू॒शु॒ऽवांस॑म्। प्रा॒तः। म॒क्षु। धि॒याऽव॑सुः। ज॒ग॒म्या॒त् ॥
पदार्थ : (नु) क्षिप्रार्थे (स्थिरम्) निश्चलम् (मरुतः) वायव इव वर्त्तमानाः (वीरवन्तम्) प्रशस्ता वीरा विद्यन्ते यस्मिँस्तम् (ऋतिषाहम्) य ऋतिं सत्यं सहते तम्। अत्रान्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः। (रयिम्) विद्याराज्यसुवर्णादिधनसमूहम् (अस्मासु) (धत्त) धरत (सहस्रिणम्) सहस्रमसंख्यातं प्रशस्तं सुखं विद्यते यस्मिंस्तम्। अत्र तपःसहस्राभ्यां विनीनी। (अष्टा०५.२.१०२) इति सूत्रेण मत्वर्थीय इनिः प्रत्ययः। (शतिनम्) (शूशुवांसम्) सर्वसुखज्ञापकं प्रापकं वा (प्रातः) प्रतिदिनम् (मक्षु) शीघ्रम् (धियावसुः) प्रज्ञाकर्मयुक्तः (जगम्यात्) भृशं प्राप्नुयात् ॥ १५ ॥
अन्वय : हे मरुतो ! यथा विद्वांसोऽस्मासु स्थिरं वीरवन्तमृतिसाहं सहस्रिणं शतिनं शूशुवांसं रयिं दधति, तथा यूयमपि प्रातर्मक्षु धत्त। यथा धियावसुर्नु जगम्यात् तं प्राप्यानन्दति तथैव यूयमप्येतत्प्राप्यानन्दतेति ॥ १५ ॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः। हे मनुष्याः ! यथाऽतिप्रशस्यो मेधावी विद्यापुरुषार्थैः संयुक्तो विद्वान् वातादिपदार्थेभ्यो दृढानि बहूनि सुखानि संसाध्यानन्दं प्राप्नोति तथा यूयमप्येतां विद्यां प्राप्यानन्दं भुञ्जत ॥ १५ ॥ अत्र वायुगुणोपदेशादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥