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Rigveda / 1 / 65 / 9

श्वसि॑त्य॒प्सु हं॒सो न सीद॒न् क्रत्वा॒ चेति॑ष्ठो वि॒शामु॑ष॒र्भुत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 65 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्तः | देवता : अग्निः | छन्द : द्विपदा विराट् | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह सभेश कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : श्वसि॑ति। अ॒प्ऽसु। हं॒सः। न। सीद॑न्। क्रत्वा॑। चेति॑ष्ठः। वि॒शाम्। उ॒षः॒ऽभुत् ॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! तुम लोग जो (अप्सु) जलों में (हंसः) पक्षी के (न) समान (सीदन्) जाता-आता डूबता-उछलता हुआ (विशाम्) प्रजाओं को (उषर्भुत्) प्रातःकाल में बोध कराने वा (क्रत्वा) अपनी बुद्धि वा कर्म्म से (चेतिष्ठः) अत्यन्त ज्ञान करानेवाले (सोमः) ओषधिसमूह के (न) समान (ऋतप्रजातः) कारण से उत्पन्न होकर वायु जल में प्रसिद्ध (वेधाः) पुष्ट करनेवाले (शिशुना) बछड़ा आदि से (पशुः) गौ आदि के (न) समान (विभुः) व्यापक हुआ (दूरेभाः) दूरदेश में दीप्तियुक्त बिजुली आदि अग्नि के समान (श्वसिति) प्राण, अपान आदि को करता है, उसको शिल्पादि कार्यों में संप्रयुक्त करो ॥ ५ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे बिजुली के विना किसी मनुष्य के व्यवहार की सिद्धि नहीं हो सकती। इस अग्निविद्या से परीक्षा करके कार्यों में संयुक्त किया हुआ अग्नि बहुत सुखों को सिद्ध करता है ॥ ५ ॥ इस सूक्त में ईश्वर, अग्निरूप बिजुली के वर्णन से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥