Rigveda / 1 / 71 / 8
आ यदि॒षे नृ॒पतिं॒ तेज॒ आन॒ट्छुचि॒ रेतो॒ निषि॑क्तं॒ द्यौर॒भीके॑। अ॒ग्निः शर्ध॑मनव॒द्यं युवा॑नं स्वा॒ध्यं॑ जनयत्सू॒दय॑च्च ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 71 | Mantra No : 8
In English:
Seer : paraasharaH shaaktaH | Devta : agniH | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : aa yadiShe nRRipati.m teja aanaTChuchi reto niShikta.m dyaurabhiike. agniH shardhamanavadya.m yuvaana.m svaadhya.m janayatsuudayachcha .
Component Words : aa. yat. iShe. nRRi.apatim. tejaH. aanaT. shuchi. retaH. ni.asiktam. dyauH. abhiike. agniH. shardham. anavadyam. yuvaanam. su.aaadhyam. janayat. suudayat. cha .
In Hindi:
ऋषि : पराशरः शाक्तः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर वह अध्यापक कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
पदपाठ : आ। यत्। इ॒षे। नृ॒ऽपति॑म्। तेजः॑। आन॑ट्। शुचि॑। रेतः॑। निऽसि॑क्तम्। द्यौः। अ॒भीके॑। अ॒ग्निः। शर्ध॑म्। अ॒न॒व॒द्यम्। युवा॑नम्। सु॒ऽआ॒ध्य॑म्। ज॒न॒य॒त्। सू॒दय॑त्। च॒ ॥
पदार्थ : हे युवते ! जैसे (द्यौः) प्रकाशस्वरूप (अग्निः) विद्युत् (अभीके) संग्राम में (इषे) इच्छा की पूर्णता के लिये (यत्) जो (निषिक्तम्) स्थापन किये हुए (शुचि) पवित्र (रेतः) वीर्य और (तेजः) प्रगल्भता को (आनट्) प्राप्त करती है, उससे युक्त तू वैसे (शर्धम्) बली (अनवद्यम्) निन्दारहित (युवानम्) युवावस्थावाले (स्वाध्यम्) उत्तम विद्यायुक्त विद्वान् (नृपतिम्) मनुष्यों में राजमान पति को स्वेच्छा से प्रसन्नतापूर्वक प्राप्त हो के (आजनयत्) सन्तानों को उत्पन्न (च) और अविद्या दुःख को (सूदयत्) दूर कर ॥ ८ ॥
भावार्थ : सब मनुष्यों जो जानना चाहिये कि कभी उत्तम विद्या वा प्रदीप्त अग्नि के समान विद्वान् के सङ्ग के विना व्यवहार और परमार्थ के सुख प्राप्त नहीं होते और अपने सन्तानों को विद्या देने के विना माता-पिता आदि कृतकृत्य नहीं हो सकते ॥ ८ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : पराशरः शाक्तः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥
पदपाठ : आ। यत्। इ॒षे। नृ॒ऽपति॑म्। तेजः॑। आन॑ट्। शुचि॑। रेतः॑। निऽसि॑क्तम्। द्यौः। अ॒भीके॑। अ॒ग्निः। शर्ध॑म्। अ॒न॒व॒द्यम्। युवा॑नम्। सु॒ऽआ॒ध्य॑म्। ज॒न॒य॒त्। सू॒दय॑त्। च॒ ॥
पदार्थ : (आ) समन्तात् (यत्) यः (इषे) इच्छापूर्त्तये (नृपतिम्) राजानम् (तेजः) प्रागल्भ्यम् (आनट्) व्याप्नोति। अत्र व्यत्ययेन परस्मैपदं श्नम् च। (शुचि) पवित्रम् (रेतः) वीर्य्यमुदकं वा। रेत इत्युदकनामसु पठितम्। (निघं०१.१२) (निषिक्तम्) संस्थापितम् (द्यौः) प्रकाशः (अभीके) संग्रामे। अभीक इति संग्रामनामसु पठितम्। (निघं०२.१७) (अग्निः) विद्युत् (शर्धम्) बलिनम् (अनवद्यम्) अनिन्दितम् (युवानम्) (स्वाध्यम्) सुष्ठु समन्ताद् विद्याऽधीयते यस्मिन् यस्यां तं वा (जनयत्) (सूदयत्) सूदयेत् (च) समुच्चये ॥ ८ ॥
अन्वय : हे युवते ! त्वं यथा द्यौरग्निरभीके इषे यन् निषिक्तं शुचि रेतस्तेजश्चानट् समन्तात् प्रापयति तेन युक्ता त्वं तथा शर्धमनवद्यं स्वाध्यं युवानं नृपतिं विद्वांसं स्वयंवरविवाहेन प्राप्यापत्यान्याजनयद् दुःखं सूदयच्च ॥ ८ ॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। न सर्वैर्मनुष्यैः कदाचित्सुविद्या शरीरबलाभ्यां विना व्यावहारिकपारमार्थिकसुखे प्राप्येते। न खलु सन्तानेभ्यो विद्यादानेन विना मातापित्रादयोऽनृणा भवितुं शक्नुवन्तीति वेद्यम् ॥ ८ ॥