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Rigveda / 1 / 71 / 10

मा नो॑ अग्ने स॒ख्या पित्र्या॑णि॒ प्र म॑र्षिष्ठा अ॒भि वि॒दुष्क॒विः सन्। नभो॒ न रू॒पं ज॑रि॒मा मि॑नाति पु॒रा तस्या॑ अ॒भिश॑स्ते॒रधी॑हि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 71 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्तः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : मा। नः॒। अ॒ग्ने॒। स॒ख्या। पित्र्या॑णि। प्र। म॒र्षि॒ष्ठाः॒। अ॒भि। वि॒दुः। क॒विः। सन्। नभः॑। न। रू॒पम्। ज॒रि॒मा। मि॒ना॒ति॒। पु॒रा। तस्याः॑। अ॒भिऽश॑स्तेः। अधि॑। इ॒हि॒ ॥

पदार्थ : हे (अग्ने) सब विद्याओं को प्राप्त हुए विद्वन् ! (जरिमा) स्तुति के योग्य (कविः) पूर्णविद्या को (विदुः) जाननेवाले (सन्) होकर आप (नभोरूपं न) जैसे आकाश सब रूपवाले पदार्थों को अपने में नाश के समय गुप्त कर लेता है, वैसे (नः) हम लोगों के (पुरा) प्राचीन (पित्र्याणि) पिता आदि से आए हुए (सख्या) मित्रता आदि कर्मों को (माभि प्र मर्षिष्ठाः) नष्ट मत कीजिए और (तस्याः) उस (अभिशस्तेः) नाश को (अधीहि) अच्छी प्रकार स्मरण रखिये, इस प्रकार का होकर जो सुख को (मिनाति) नष्ट करता है, उसको दूर कीजिये ॥ १० ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे रूपवाले पदार्थ सूक्ष्म अवस्था को प्राप्त होकर अन्तरिक्ष में नहीं दीखते, वैसे हम लोगों के मित्रपन आदि व्यवहार नष्ट न होवें, किन्तु हम सब लोग विरोध सर्वथा छोड़कर परस्पर मित्र होके सब काल में सुखी रहें ॥ १० ॥ इस सूक्त में ईश्वर, सभाध्यक्ष, स्त्री, पुरुष, बिजुली और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥