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Rigveda / 1 / 73 / 9

अर्व॑द्भिरग्ने॒ अर्व॑तो॒ नृभि॒र्नॄन् वी॒रैर्वी॒रान्व॑नुयामा॒ त्वोताः॑। ई॒शा॒नासः॑ पितृवि॒त्तस्य॑ रा॒यो वि सू॒रयः॑ श॒तहि॑मा नो अश्युः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 73 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्तः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वे मनुष्य कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : अर्व॑त्ऽभिः। अ॒ग्ने॒। अर्व॑तः। नृभिः॑। नॄन्। वी॒रैः। वी॒रान्। व॒नु॒या॒म॒। त्वाऽऊ॑ताः। ई॒शा॒नासः॑। पि॒तृ॒ऽवि॒त्तस्य॑। रा॒यः। वि। सू॒रयः॑। श॒तऽहि॑माः। नः॒। अ॒श्युः॒ ॥

पदार्थ : हे (अग्ने) सब सुखों के प्राप्त करानेवाले परमेश्वर ! आपसे (त्वोताः) रक्षित हम लोग (अर्वद्भिः) प्रशंसा योग्य घोड़ों से (अर्वतः) घोड़ों को (नृभिः) विद्यादि श्रेष्ठ गुणयुक्त मनुष्यों से (नॄन्) शिक्षा धर्म्मवाले मनुष्यों और (वीरैः) शौर्यादियुक्त शूरवीरों से (वीरान्) शूरता आदि गुणवाले शूरवीरों की प्राप्ति (वनुयाम) होने को चाहें और याचना करें। आपकी कृपा से (पितृवित्तस्य) पिता के भोगे हुए (रायः) धन के (ईशानासः) समर्थ स्वामी हम हों और (सूरयः) मेधावी विद्वान् (नः) हम लोगों को (शतहिमाः) सौ हेमन्त ऋतु पर्यन्त (व्यश्युः) प्राप्त होते रहें ॥ ९ ॥

भावार्थ : मनुष्य लोग ईश्वर के गुण, कर्म्म, स्वभाव के अनुकूल वर्त्तने और अपने पुरुषार्थ के विना उत्तम विद्या और पदार्थों के प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकते, इससे इसका सदा अनुष्ठान करना उचित है ॥ ९ ॥