Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 77 / 2

यो अ॑ध्व॒रेषु॒ शंत॑म ऋ॒तावा॒ होता॒ तमू॒ नमो॑भि॒रा कृ॑णुध्वम्। अ॒ग्निर्यद्वेर्मर्ता॑य दे॒वान्त्स चा॒ बोधा॑ति॒ मन॑सा यजाति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 77 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : यः। अ॒ध्व॒रेषु॑। शम्ऽत॑मः। ऋ॒तऽवा॑। होता॑। तम्। ऊँ॒ इति॑। नमः॑ऽभिः। आ। कृ॒णु॒ध्व॒म्। अ॒ग्निः। यत्। वेः। मर्ता॑य। दे॒वान्। सः। च॒। बोधा॑ति। मन॑सा। य॒जा॒ति॒ ॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! तुम लोग (यः) जो (अग्निः) विज्ञानस्वरूप परमेश्वर वा विद्वान् (अध्वरेषु) सदैव ग्रहण करने योग्य यज्ञों में (शन्तमः) अत्यन्त आनन्द को देनेहारा तथा (ऋतावा) शुभ गुण, कर्म,और स्वभाव से सत्य है (होता) सब जगत् और विज्ञान का देनेवाला है तथा (यत्) जो (मर्त्ताय) मनुष्य के लिये (देवान्) विज्ञान और श्रेष्ठ गुणों को (बोधाति) अच्छे प्रकार जाने (च) और (यजाति) संगत करें, इसलिये (तम् उ) उसी परमेश्वर वा विद्वान् को (नमोभिः) नमस्कार वा अन्नों से प्रसन्न (आ कृणुध्वम्) करो ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर और धर्मात्मा मनुष्य के विना मनुष्य को विद्या का देनेवाला कोई दूसरा नहीं है तथा उन दोनों को छोड़ के उपासना तथा सत्कार भी किसी का न करना चाहिये ॥ २ ॥