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Rigveda / 1 / 80 / 1

इ॒त्था हि सोम॒ इन्मदे॑ ब्र॒ह्मा च॒कार॒ वर्ध॑नम्। शवि॑ष्ठ वज्रि॒न्नोज॑सा पृथि॒व्या निः श॑शा॒ अहि॒मर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 80 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदास्तारपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब ८० वें सूक्त का आरम्भ किया जाता है। इसके प्रथम मन्त्र में सभापति आदि का वर्णन किया है ॥

पदपाठ : इ॒त्था। हि। सोमे॑। इत्। मदे॑। ब्र॒ह्मा। च॒कार॑। वर्ध॑नम्। शवि॑ष्ठ। व॒ज्रि॒न् ओज॑सा। पृ॒थि॒व्याः। निः। श॒शाः॒। अहि॑म्। अर्च॑न्। अनु॑। स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

पदार्थ : हे (शविष्ठ) बलयुक्त (वज्रिन्) शस्त्रास्त्रविद्या से सम्पन्न सभापति ! जैसे सूर्य (अहिम्) मेघ को जैसे (ब्रह्मा) चारों वेद के जाननेवाला (ओजसा) अपने पराक्रम से (पृथिव्याः) विस्तृत भूमि के मध्य (मदे) आनन्द और (सोमे) ऐश्वर्य की प्राप्ति करानेवाले में (स्वराज्यम्) अपने राज्य की (अन्वर्चन्) अनुकूलता से सत्कार करता हुआ (इत्था) इस हेतु से (वर्धनम्) बढ़ती को (चकार) करे, वैसे ही तू सब अन्यायाचरणों को (इत्) (हि) ही (निश्शशाः) दूर कर दे ॥ १ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि चक्रवर्त्तिराज्य की सामग्री इकट्ठी कर और उसकी रक्षा करके विद्या और सुख की निरन्तर वृद्धि करें ॥ १ ॥