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Rigveda / 1 / 80 / 7

इन्द्र॒ तुभ्य॒मिद॑द्रि॒वोऽनु॑त्तं वज्रिन्वी॒र्य॑म्। यद्ध॒ त्यं मा॒यिनं॑ मृ॒गं तमु॒ त्वं मा॒यया॑वधी॒रर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 80 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर इसके कृत्य का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : इन्द्र॑। तुभ्य॑म्। इत्। अ॒द्रि॒ऽवः॒। अनु॑त्तम्। व॒ज्रि॒न्। वी॒र्य॑म्। यत्। ह॒। त्यम्। मा॒यिन॑म्। मृ॒गम्। तम्। ऊँ॒ इति॑। त्वम्। मा॒यया॑। अ॒व॒धीः॒। अर्च॑न्। अनु॑। स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

पदार्थ : हे (अद्रिवः) मेघ शिखरवत् पर्वतादि युक्त स्वराज्य से सुभूषित (वज्रिन्) अत्युत्तम शस्त्रास्त्रों से युक्त (इन्द्र) सभेश ! (यत्) जिससे (त्वम्) उस (मायिनम्) कपटी (मृगम्) मृग के तुल्य पदार्थ भोगनेवाले को (मायया) बुद्धि से (ह) निश्चय करके (अवधीः) हनन करता है (दिवः) सूर्य्य के समान (अनुत्तम्) स्वाधीन पुरुषार्थ से ग्रहण किये हुए (वीर्यम्) पराक्रम को ग्रहण करके (स्वराज्यम्) अपने राज्य का (अन्वर्चन्) सत्कार करता हुआ (तमु) उसी दुष्ट को दण्ड देता है, उस (तुभ्यमित्) तेरे ही लिये उत्तम-उत्तम धन हम लोग देवें ॥ ७ ॥

भावार्थ : जो प्रजा रक्षा के लिये सूर्य के समान शरीर और आत्मा तथा न्यायविद्याओं का प्रकाश करके कपटियों को दण्ड देते हैं, वे राज्य के बढ़ाने और करों को प्राप्त होने में समर्थ होते हैं ॥ ७ ॥