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Rigveda / 1 / 80 / 14

अ॒भि॒ष्ट॒ने ते॑ अद्रिवो॒ यत्स्था जग॑च्च रेजते। त्वष्टा॑ चि॒त्तव॑ म॒न्यव॒ इन्द्र॑ वेवि॒ज्यते॑ भि॒यार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 80 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर इस सभाध्यक्ष को क्या करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : अ॒भि॒ऽस्त॒ने। ते॒। अ॒द्रि॒ऽवः॒। यत्। स्थाः। जग॑त्। च॒। रे॒ज॒ते॒। त्वष्टा॑। चि॒त्। तव॑। म॒न्यवे॑। इ॒न्द्र॒। वे॒वि॒ज्यते॑। भि॒या। अर्च॑न्। अनु॑। स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

पदार्थ : हे (अद्रिवः) बहुमेघयुक्त सूर्य्य के समान (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्त सभाध्यक्ष (यत्) जब (ते) आपके (अभिष्टने) सर्वथा उत्तम न्याययुक्त व्यवहार में (स्थाः) स्थावर (जगच्च) और जङ्गम (रेजते) कम्पायमान होता है तथा जो (त्वष्टा) शत्रुच्छेदक सेनापति है (तव) उसके (मन्यवे) क्रोध के लिये (भिया चित्) भय से भी (वेविज्यते) उद्विग्न होता है, तब आप (स्वराज्यम्) अपने राज्य का (अन्वर्चन्) सत्कार करते हुए सुखी हो सकते हैं ॥ १४ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिए कि जैसे सूर्य के योग से प्राणधारी अपने-अपने कर्म में वर्त्तते और सब भूगोल अपनी-अपनी कक्षा में यथावत् भ्रमण करते हैं, वैसे ही सभा से प्रशासन किये राज्य के संयोग से सब मनुष्यादि प्राणी धर्म के साथ अपने-अपने व्यवहार में वर्त्त के सन्मार्ग में अनुकूलता से गमनागमन करते हैं ॥ १४ ॥