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Rigveda / 1 / 81 / 3

यदु॒दीर॑त आ॒जयो॑ धृ॒ष्णवे॑ धीयते॒ धना॑। यु॒क्ष्वा म॑द॒च्युता॒ हरी॒ कं हनः॒ कं वसौ॑ दधो॒ऽस्माँ इ॑न्द्र॒ वसौ॑ दधः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 81 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदास्तारपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर इनको परस्पर कैसे वर्त्ताव रखना चाहिये, सो अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : यत्। उ॒त्ऽईर॑ते। आ॒जयः॑। धृ॒ष्णवे॑। धी॒य॒ते॒। धना॑। यु॒क्ष्व। म॒द॒ऽच्युता॑। हरी॒ इति॑। कम्। हनः॑। कम्। वसौ॑। द॒धः॒। अस्मान्। इ॒न्द्र॒। वसौ॑। दधः ॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) सेना के स्वामी ! (यत्) जब (आजयः) संग्राम (उदीरते) उत्कृष्टता से प्राप्त हों तब (धृष्णवे) दृढ़ता के लिये (धना) धनों को (धीयते) धरता है सो तू (मदच्युता) बड़े बलिष्ठ (हरी) घोड़ों को रथादि में (युक्ष्व) युक्त कर (कम्) किसी शत्रु को (हनः) मार (कम्) किसी मित्र को (वसौ) धन कोष में (दधः) धारण कर और (अस्मान्) हमको (वसौ) धन में (दधः) अधिकारी कर ॥ ३ ॥

भावार्थ : जब युद्ध करना हो तो तब सेनापति लोग सवारी शतघ्नी (तोप), भुशुण्डी (बंदूक) आदि शस्त्र, आग्नेय आदि अस्त्र और भोजन-आच्छादन आदि सामग्री को पूर्ण करके किन्हीं शत्रुओं को मार, किन्ही मित्रों का सत्कार कर, युद्धादि कर्मों में धर्मात्मा जनों को संयुक्त कर, युक्ति से युद्ध कराके सदा विजय को प्राप्त हों ॥ ३ ॥