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Rigveda / 1 / 86 / 5

अ॒स्य श्रो॑ष॒न्त्वा भुवो॒ विश्वा॒ यश्च॑र्ष॒णीर॒भि। सूरं॑ चित्स॒स्रुषी॒रिषः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 86 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वे क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : अ॒स्य। श्रो॒ष॒न्तु॒। आ। भुवः॑। विश्वाः॑। यः। च॒र्ष॒णीः। अ॒भि। सूर॑म्। चि॒त्। स॒स्रुषीः॑। इषः॑ ॥

पदार्थ : हे मनुष्यो आप लोग (अस्य) इस सुशिक्षित विद्वान् के (इषः) इष्टसाधक किरणों के (चित्) समान (विश्वाः) सब (सस्रुषीः) प्राप्त होने के योग्य (आभुवः) सब ओर से सुखयुक्त (चर्षणीः) मनुष्यरूप प्रजा को जैसे किरणें (सूरम्) सूर्य को प्राप्त होती हैं, वैसे (अभि श्रोषन्तु) सब ओर से सुनो ॥ ५ ॥

भावार्थ : जो मनुष्य अच्छी शिक्षा से युक्त, अच्छे प्रकार परीक्षित, शुभलक्षणयुक्त, सम्पूर्ण विद्याओं का वेत्ता, दृढ़ाङ्ग, अतिबली, पढ़ानेहारा, श्रेष्ठ सहाय से सहित, पुरुषार्थी धार्मिक विद्वान् है, वही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त होके प्रजा के दुःख का निवारण कर पराविद्या को सुनके प्राप्त होता है, इससे विरुद्ध मनुष्य नहीं ॥ ५ ॥