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Rigveda / 1 / 86 / 7

सु॒भगः॒ स प्र॑यज्यवो॒ मरु॑तो अस्तु॒ मर्त्यः॑। यस्य॒ प्रयां॑सि॒ पर्ष॑थ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 86 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : मरुतः | छन्द : पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : उनकी रक्षा और शिक्षा पाया हुआ मनुष्य कैसा होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : सु॒ऽभगः॑। सः। प्र॒ऽय॒ज्य॒वः॒। मरु॑तः। अ॒स्तु॒। मर्त्यः॑। यस्य॑। प्रयां॑सि। पर्ष॑थ ॥

पदार्थ : हे (प्रयज्यवः) अच्छे-अच्छे यज्ञादि कर्म करनेवाले (मरुतः) सभाध्यक्ष आदि विद्वानो ! तुम (यस्य) जिसके लिये (प्रयांसि) अत्यन्त प्रीति करने योग्य मनोहर पदार्थों को (पर्षथ) परसते अर्थात् देते हो (सः) वह (मर्त्यः) मनुष्य (सुभगः) श्रेष्ठ धन और ऐश्वर्य्ययुक्त (अस्तु) हो ॥ ७ ॥

भावार्थ : जिन मनुष्यों के सभाध्यक्ष आदि विद्वान् रक्षा करनेवाले हैं, वे क्योंकर सुख और ऐश्वर्य्य को न पावें? ॥ ७ ॥