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Rigveda / 1 / 90 / 5

उ॒त नो॒ धियो॒ गोअ॑ग्राः॒ पूष॒न्विष्ण॒वेव॑यावः। कर्ता॑ नः स्वस्ति॒मतः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 90 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वे क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : उ॒त। नः॒। धियः॑। गोऽअ॑ग्राः। पूष॑न्। विष्णो॒ उति॑। एव॑ऽयावः। कर्त॑। नः॒। स्व॒स्ति॒ऽमतः॑ ॥

पदार्थ : हे (पूषन्) विद्या और उत्तम शिक्षा से पोषण करने वा (विष्णो) समस्त विद्याओं में व्यापक होने वा (एवयावः) जिससे सब व्यवहार ज्ञात होता है, उस अगाध बोध को प्राप्त होनेवाले विद्वान् लोगो ! तुम (नः) हम लोगों के लिये (गोअग्राः) इन्द्रिय अग्रगामी जिनमें हों, उन (धियः) उत्तम बुद्धि वा उत्तम कर्मों को (कर्त्त) प्रसिद्ध करो (उत) उसके पश्चात् (नः) हम लोगों को (स्वस्तिमतः) सुखयुक्त करो ॥ ५ ॥

भावार्थ : पढ़नेवालों को चाहिये कि पढ़ानेवाले जैसे विद्या की शिक्षा करे, वैसे उनका ग्रहण कर अच्छे विचार से नित्य उनकी उन्नति करें ॥ ५ ॥