Rigveda / 1 / 91 / 4
या ते॒ धामा॑नि दि॒वि या पृ॑थि॒व्यां या पर्व॑ते॒ष्वोष॑धीष्व॒प्सु। तेभि॑र्नो॒ विश्वै॑: सु॒मना॒ अहे॑ळ॒न्राज॑न्त्सोम॒ प्रति॑ ह॒व्या गृ॑भाय ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 91 | Mantra No : 4
In English:
Seer : gotamo raahuugaNaH | Devta : somaH | Metre : svaraaTpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yaa te dhaamaani divi yaa pRRithivyaa.m yaa parvateShvoShadhiiShvapsu. tebhirno vishvaiH sumanaa aheLanraajantsoma prati havyaa gRRibhaaya .
Component Words : yaa. te. dhaamaani. divi. yaa. pRRithivyaam. yaa. parvateShu. oShadhiiShu. ap.asu. tebhiH. naH. vishvaiH. su.amanaaH. aheLan. raajan. soma. prati. havyaa. gRRibhaaya . 1.91.4
In Hindi:
ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : सोमः | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर उन दोनों के कैसे काम हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : या। ते॒। धामा॑नि। दि॒वि। या। पृ॒थि॒व्याम्। या। पर्व॑तेषु। ओष॑धीषु। अ॒प्ऽसु। तेभिः॑। नः॒। विश्वैः॑। सु॒ऽमनाः॑। अहे॑ळन्। राज॑न्। सो॒म॒। प्रति॑। ह॒व्या। गृ॒भा॒य॒ ॥ १.९१.४
पदार्थ : हे (सोम) सबको उत्पन्न करनेवाले (राजन्) राजा ! (ते) आपके (या) जो (धामानि) नाम, जन्म और स्थान (दिवि) प्रकाशमय सूर्य्य आदि पदार्थ वा दिव्य व्यवहार में वा (या) जो (पृथिव्याम्) पृथिवी में वा (या) जो (पर्वतेषु) पर्वतों वा (ओषधीषु) ओषधियों वा (अप्सु) जलों में है (तेभिः) उन (विश्वैः) सबसे (अहेडन्) अनादर न करते हुए (सुमनाः) उत्तम ज्ञानवाले आप (हव्याः) देने-लेने योग्य कामों को (नः) हमको (प्रति+गृभाय) प्रत्यक्ष ग्रहण कराइये ॥ ४ ॥
भावार्थ : जैसे जगदीश्वर अपनी रची सृष्टि में वेद के द्वारा इस सृष्टि के कामों को दिखाकर सब विद्याओं का प्रकाश करता है, वैसे ही विद्वान् पढ़े हुए अङ्ग और उपाङ्ग सहित वेदों से हस्तक्रिया के साथ कलाओं की चतुराई को दिखाकर सबको समस्त विद्या का ग्रहण करावें ॥ ४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : सोमः | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनस्तयोः कीदृशानि कर्माणि सन्तीत्युपदिश्यते ।
पदपाठ : या। ते॒। धामा॑नि। दि॒वि। या। पृ॒थि॒व्याम्। या। पर्व॑तेषु। ओष॑धीषु। अ॒प्ऽसु। तेभिः॑। नः॒। विश्वैः॑। सु॒ऽमनाः॑। अहे॑ळन्। राज॑न्। सो॒म॒। प्रति॑। ह॒व्या। गृ॒भा॒य॒ ॥ १.९१.४
पदार्थ : (या) यानि (ते) तव (धामानि) नामजन्मस्थानानि (दिवि) प्रकाशमये सूर्य्यादौ दिव्यव्यवहारे वा (या) यानि (पृथिव्याम्) (या) यानि (पर्वतेषु) (ओषधीषु) (अप्सु) (तेभिः) तैः (नः) अस्मान् (विश्वैः) सर्वैः (सुमनाः) शोभनविज्ञानः (अहेडन्) अनादरमकुर्वन् (राजन्) सर्वाधिपते (सोम) सर्वोत्पादक (प्रति) (हव्या) हव्यानि दातुमादातुं योग्यानि (गृभाय) गृहाण ग्राहय वा। अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः। ग्रह धातोर्हस्य भत्वं श्नः स्थाने शायजादेशश्च ॥ ४ ॥
अन्वय : हे सोम राजन् ते तव या यानि धामानि दिवि या यानि पृथिव्यां या यानि पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु सन्ति। तेभिर्विश्वैः सर्वैरहेडन् सुमनास्त्वं हव्यानि नः प्रति गृभाय ॥ ४ ॥
भावार्थ : यथा जगदीश्वरः स्वसृष्टौ वेदद्वारा सृष्टिक्रमान् दर्शयित्वा सर्वा विद्याः प्रकाशयति तथैव विद्वांसोऽधीतैः साङ्गोपाङ्गैर्वेदैर्हस्तक्रियया च कलाकौशलानि दर्शयित्वा सर्वान् सकला विद्या ग्राहयेयुः ॥ ४ ॥