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Samveda/856

अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम्। समुद्रस्याधि विष्टपे मनीषिणो मत्सरासो मदच्युतः।।॥८५६

Veda : Samveda | Mantra No : 856

In Hindi:

ऋषि : सप्तर्षयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ५१८ पर आनन्दरस का पान किये हुए मनुष्यों के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ ज्ञानी गुरुओं का विषय कहा जाता है।

पदपाठ : अभि ।सोमासः ।आयवः ।पयन्ते ।मद्यम् ।मदम् ।समुद्रस्य ।सम् ।उद्रस्य ।अधि ।विष्टपे ।मनीषिणः ।मत्सरासः ।मदच्युतः ।मद ।च्युतः॥

पदार्थ : (आयवः) क्रियाशील, (मनीषिणः) मननशील, (मत्सरासः) उत्साह का सञ्चार करनेवाले, (मदच्युतः) हर्ष की वर्षा करनेवाले (सोमासः) विद्यारस से परिपूर्ण गुरुजन (समुद्रस्य) ज्ञानसागर के (विष्टपे अधि) लोक में अर्थात् गुरुकुल में (मद्यम्) आनन्दजनक (मदम्) तृप्तिप्रद ज्ञानरस को (अभि पवन्ते) शिष्यों के प्रति प्रवाहित करते हैं ॥१॥

भावार्थ : विद्यार्थी जन सुयोग्य गुरुओं के पास से अमृतवर्षी ज्ञानरस को पाकर, स्नातक होकर अन्यों को वह तृप्तिप्रद ज्ञानरस पिलाया करें ॥१॥