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Samveda/1525

आ नो अग्ने रयिं भर सत्रासाहं वरेण्यम्। विश्वासु पृत्सु दुष्टरम्॥१५२५

Veda : Samveda | Mantra No : 1525

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में फिर जगदीश्वर से प्रार्थना है।

पदपाठ : आ । नः । अग्ने । रयिम् । भर । सत्रासाहम् । सत्रा । साहम् । वरेण्यम् । विश्वासु । पृत्सु । दुष्टुरम् । दुः । तरम॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! आप (नः) हमारे लिए (सत्रासाहम्) एक साथ अनेक विपदाओं को दूर करनेवाले, (वरेण्यम्) वरणीय, विश्वासु पृत्सु) सब सङ्ग्रामों में (दुष्टरम्) दुस्तर, अच्छेद्य (रयिम्) वीरतारूप ऐश्वर्य को (आभर) प्रदान करो ॥३॥

भावार्थ : परमवीर परमेश्वर का ध्यान करके हम वीरगणों में अग्रगण्य होते हुए सब विपदाओं तथा सब आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को पराजित कर देवें ॥२॥