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Samveda/1849

आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्। सङ्क्रन्दनोऽनिमिष एकवीरः शत सेना अजयत्साकमिन्द्रः॥१८४९

Veda : Samveda | Mantra No : 1849

In Hindi:

ऋषि : अप्रतिरथ ऐन्द्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम मन्त्र में सेनापति के दृष्टान्त से जीवात्मा का वर्णन है।

पदपाठ : आशुः । शिशानः । वृषभः । न । भीमः । घनाघनः । क्षीभणः । चर्षणीनाम् । संक्रन्दनः । सम् । क्रन्दनः । अनिमिषः । अ । निमिषः । एकवीरः । एक । वीरः । शतम् । सेनाः । अजयत् । साकम् । इन्द्रः॥

पदार्थ : (आशुः) शीघ्रकारी, (शिशानः वृषभः न) तीक्ष्ण सींगोंवाले बैल के समान (भीमः) विघ्न डालनेवालों के लिए भयङ्कर, (घनाघनः) द्वेषियों का वध करनेवाला, (चर्षणीनाम्) बाधा डालनेवाले मनुष्यों को (क्षोभणः) विक्षुब्ध कर देनेवाला, (सङ्क्रन्दनः) शत्रुओं को रुलानेवाला, (अनिमिषः) लक्ष्य पर अपलक दृष्टि रखनेवाला, (एकवीरः) अद्वितीय वीर, (इन्द्रः) सेनापति के तुल्य जीवात्मा (साकम्) एक साथ (शतं सेनाः) सौ आन्तरिक और बाह्य सेनाओं को (अजयत्) जीत सकता है ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार तथा वीर रस है ॥१॥

भावार्थ : जैसे राष्ट्र में वीर सेनापति अपने पराक्रम से सब शत्रु सेनाओं को जीत लेता है, वैसे ही शरीर में जीवात्मा आन्तरिक और बाह्य देवासुरसङ्ग्राम में सब विघ्नकारियों को जीत कर अपना साम्राज्य स्थापित करे ॥१॥