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Samveda/1865

अमित्रसेनां मघवन्नस्मां छत्रुयतीमभि। उभौ तामिन्द्र वृत्रहन्नग्निश्च दहतं प्रति॥१८६५

Veda : Samveda | Mantra No : 1865

In Hindi:

ऋषि : पायुर्भारद्वाजः | देवता : इन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : आगे फिर उसी विषय को कहा गया है।

पदपाठ : अमित्रसेनाम् । अमित्र । सेनाम् । मघवन् । अस्मान् । शत्रुयतीम् । अभि । उभो । ताम् । इन्द्र । वृत्रहन् । वृत्र । हन । अग्निः । च । दहतम् । प्रति॥ ।

पदार्थ : हे (मघवन्) दिव्य ऐश्वर्यवाले, (वृत्रहन्) शत्रुहन्ता (इन्द्र) वीर जीवात्मन् ! (अस्मान् अभि) हमारे प्रति (शत्रुयतीम्) शत्रुता का आचरण करनेवाली (ताम्) उस विकराल (अमित्रसेनाम्) रिपु-सेना को, तू (अग्निः च) और तैजस मन (उभौ) दोनों (प्रतिदहतम्) भस्म कर दो ॥२॥

भावार्थ : जैसे राजा और सेनापति के उद्योग से सब बाह्य शत्रु निःशेष हो जाते हैं, वैसे ही आन्तरिक देवासुरसङ्ग्राम में जीवात्मा और मन सब विघ्नों और रिपुओं को दग्ध करने में समर्थ होते हैं ॥२॥