In Hindi:
पदपाठ : वस्तुसाम्ये चित्तभेदात् तयोः विभक्तः पन्थाः॥
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : कुतश्चैतदन्याय्यम्—
हिंदी में अर्थ : (कुतः च) और किस कारण से (एतद्) यह मान्यता = सत्तावान् पदार्थ को ज्ञानपरिकल्पना मात्र मानना (अन्याय्यम्) न्यायविरुद्ध = युक्तिविरुद्ध है —
हिंदी में अर्थ : (वस्तुसाम्ये) वस्तु के एक होने पर भी (चित्तभेदात्) विभिन्न चित्तों में ज्ञान की भिन्नता होने से (तयोः) वस्तु और ज्ञान का (पन्थाः) मार्ग = अस्तित्व = सत्ता (विभक्तः) भिन्न-भिन्न है॥
व्यास भाष्य : बहुचित्तावलम्बनीभूतमेकं वस्तु साधारणं, तत्खलु नैकचित्तपरिकल्पितं नाप्यनेकचित्तपरिकल्पितं किन्तु स्वप्रतिष्ठम्। कथं? वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्। धर्मापेक्षं चित्तस्य वस्तुसाम्येऽपि सुखज्ञानं भवत्यधर्मापेक्षं तत एव दुःखज्ञानमविद्यापेक्षं तत एव मूढज्ञानं सम्यग्दर्शनापेक्षं तत एव माध्यस्थज्ञानमिति। कस्य तच्चित्तेन परिकल्पितम्? न चान्यचित्तपरिकल्पितेनार्थेनान्यस्य चित्तोपरागो युक्तः। तस्माद्वस्तुज्ञानयोर्ग्राह्यग्रहणभेदभिन्नयोर्विभक्तः पन्थाः। नानयोः संकरगन्धोऽप्यस्तीति।
सांख्यपक्षे पुनर्वस्तु त्रिगुणं चलं च गुणवृत्तमिति धर्मादिनिमित्तापेक्षं चित्तैरभिसम्बध्यते। निमित्तानुरूपस्य च प्रत्ययस्योत्पद्यमानस्य तेन तेनाऽऽत्मना हेतुर्भवति। केचिदाहुः ज्ञानसहभूरेवार्थो भोग्य-त्वात्सुखादिवदिति। त एतया द्वारा साधारणत्वं बाधमानाः पूर्वोत्तरेषुक्षणेषु वस्तुरूपमेवापह्नुवते॥
हिंदी में अर्थ : (बहुचित्तावलम्बनीभूतम्) बहुत चित्तों का आलम्बन = विषय बना हुआ (एकम्) एक (वस्तु) पदार्थ (साधारणम्) साधारण = समान रूप से पुरुष मात्र द्वारा धारण किया जाता है। (तत् खलु) और वह पदार्थ (न एक चित्तपरिकल्पितम्) न तो किसी एक पुरुष के चित्त द्वारा परिकल्पित है, (न अपि अनेकचित्तपरिकल्पितम्) और न ही अनेक पुरुषों के चित्तों द्वारा परिकल्पित है; (किन्तु) किन्तु वह पदार्थ (स्वप्रतिष्ठम्) अपने स्वरूप = अपनी सत्ता में स्थित होता है। (कथम्) यह किस प्रकार से सिद्ध होता है? (वस्तुसाम्ये) वस्तु के समान होने पर भी (चित्तभेदात्) उसे आलम्बन करने वाले चित्तों में भेद होने से वस्तु की सत्ता सिद्ध होती है।
(वस्तुसाम्ये अपि) वस्तु के एक होने पर भी (चित्तस्य) चित्त को (धर्मापेक्षम्) धर्म रूप निमित्त की अपेक्षा से (सुखज्ञानम् भवति) सुख का ज्ञान होता है; (ततः एव) उसी वस्तु से (अधर्मापेक्षम्) अधर्म रूप निमित्त की अपेक्षा से (दुःखज्ञानम्) दुःख का ज्ञान होता है; (ततः एव) उसी वस्तु से (अविद्यापेक्षम्) अविद्या रूप निमित्त की अपेक्षा से (मूढज्ञानम्) मूढज्ञान = मोहात्मक अनुभव होता है; (ततः एव) और उसी वस्तु से ही (सम्यग्दर्शनापेक्षम्) यथार्थ ज्ञान की अपेक्षा से (माध्यस्थज्ञानम् इति) माध्यस्थ = उदासीनता का अनुभव होता है। ऐसी स्थिति में (तत्) वह वस्तु (कस्य चित्तेन) किस चित्त के द्वारा (परिकल्पितम्) परिकल्पित है ? अर्थात् किसी चित्त द्वारा नहीं।
(च) और फिर (अन्यचित्तपरिकल्पितेन) अन्य पुरुष के चित्त द्वारा परिकल्पित (अर्थेन) पदार्थ से (अन्यस्य) दूसरे पुरुष के (चित्तोपरागः) चित्त में उपराग = लगाव (न युक्तः) युक्त = संगत नहीं हो सकता। (तस्मात्) इसलिये (ग्राह्यग्रहणभेदभिन्नयोः) ग्राह्य = पदार्थ, और ग्रहण = चित्त के भेद से भिन्न, (वस्तुज्ञानयोः) वस्तु और ज्ञान = चित्त का (पन्थाः) मार्ग = अस्तित्व (विभक्तः) भिन्न-भिन्न है। (अनयोः) इन दोनों के (संकरगन्धः) संकीर्ण = मिश्रण अर्थात् अभिन्न होने की गन्ध = सम्भावना (अपि) भी (न अस्ति इति) नहीं है।
(सांख्यपक्षे पुनः) सांख्यपक्ष में तो (वस्तु त्रिगुणम्) प्रत्येक वस्तु = पदार्थ त्रिगुणात्मक = सत्त्व, रज और तम गुण वाला है, (चलम् च गुणवृत्तम्) और गुणों का स्वभाव चञ्चल है (इति) इसलिये (धर्मादिनिमित्तापेक्षम्) धर्मादि = धर्म, अधर्म, अविद्या, सम्यग्दर्शन रूप निमित्तों की अपेक्षा से ही पदार्थ (चित्तैः अभिसम्बध्यते) पुरुषों के चित्तों के साथ सम्बन्धित होता है। (च) और (निमित्तानुरूपस्य) उन निमित्तों के अनुरूप (उत्पद्यमानस्य) उत्पद्यमान (प्रत्ययस्य) (सुख, दुःख, मोह, उदासीनता रूप) ज्ञानों का (तेन तेन आत्मना) उस-उस रूप से (हेतुः भवति) कारण होता है।
(केचित् आहुः) कुछ (क्षणिकवादी) कहते हैं कि — “(भोग्यत्वात्) भोग्य होने से, (सुखादिवत्) सुख-दुःख आदि के समान, (अर्थः) बाह्य पदार्थ (ज्ञानसहभूः एव इति) ज्ञान के साथ ही उत्पन्न होने वाला है।” (ते) वे लोग (एतया) इस मान्यता के (द्वारा) द्वारा (साधारणत्वम्) साधारणत्व = सर्वसाधारण पुरुषों द्वारा समान रूप से जानी जाने वाली वस्तु का (बाधमानाः) खण्डन करते हुए (पूर्वोत्तरेषुक्षणेषु) ज्ञान के पहले और बाद के क्षणों में (वस्तुरूपम् एव) बाह्य पदार्थ के स्वरूप का ही (अपह्नुवते) अपलाप = निषेध करते हैं॥
वैदिक योग मीमांसा : विज्ञानवादियों / क्षणिकवादियों की यह मान्यता है कि — “पदार्थ मात्र चित्त की परिकल्पना है। पदार्थ यथार्थ रूप से न होता हुआ स्वप्न ज्ञान के समान प्रतीत होता है। जैसे स्वप्न में पदार्थ नहीं होता, परन्तु स्वप्नावस्था में ज्ञात होता है, और उस ज्ञान से पुरुष सुख-दुःख आदि का अनुभव भी करता है। परन्तु जागने पर न तो पदार्थ ही उपस्थित होता है, और न ही वह सुख-दुःख आदि की स्थिति रहती है। इसी प्रकार जाग्रतावस्था में उपलब्ध पदार्थ भी चित्त द्वारा कल्पित होते हैं, यथार्थ रूप से नहीं होते।” ऐसा मानना तर्क और प्रमाण के विरुद्ध क्यों है? इसके सन्दर्भ में महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि किसी वस्तु के एक होने पर भी, भिन्न-भिन्न पुरुषों के चित्तों में उस वस्तु का भिन्न-भिन्न ज्ञान होने से, वस्तु और ज्ञान की सत्ता पृथक्-पृथक् सिद्ध होती है।
महर्षि व्यास इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि कोई भी पदार्थ विभिन्न पुरुषों द्वारा इन्द्रिय-अर्थ सन्निकर्ष से उपलब्ध होता है। ऐसा पदार्थ न तो किसी एक पुरुष के चित्त द्वारा कल्पित किया जाता है, और न ही बहुत से पुरुषों के चित्तों द्वारा कल्पित किया जाता है; किन्तु वह पदार्थ, सत्त्वादि गुणों के विभिन्न मिश्रण से परिणाम को प्राप्त होता हुआ, अपनी स्वयं की सत्ता के कारण उपलब्ध होता है। अतः विभिन्न चित्तों द्वारा प्राप्त होता हुआ, कोई भी पदार्थ अपनी सत्ता से ही स्थित रहता है।
एक वस्तु, किसी पुरुष के चित्त में, धर्मरूप निमित्त के कारण, सुख को उत्पन्न करती है; वही वस्तु, अधर्म रूप निमित्त अपेक्षा से, दूसरे पुरुष के चित्त में दुःख को उत्पन्न करती है; वही वस्तु, अविद्या रूप निमित्त की अपेक्षा से, किसी अन्य पुरुष के चित्त में मोह = मूढता को उत्पन्न करती है; और वही वस्तु, यथार्थ ज्ञान की अपेक्षा से, विरक्त पुरुष के चित्त में उदासीनता = उपेक्षा को उत्पन्न करती है। इसका उदाहरण भोज ने दिया है — रूप लावण्य युक्त स्त्री के प्राप्त होने पर उसका पति, सुख का अनुभव करता है; उसी स्त्री से उसकी सपत्नी = सौत, अधर्म के कारण (पति से उपेक्षित होती हुई) दुःख का अनुभव करती है; वही स्त्री, अन्य कामुक लम्पट पुरुष के चित्त में, उसकी अविद्या के कारण, मोह का कारण बन जाती है; और उसी स्त्री के शरीर की यथार्थता = अशुचिता को जानते हुए, योगी के चित्त में विरक्तता, उदासीनता की उत्पत्ति होती है। अतः एक ही स्त्री, विभिन्न निमित्तों के कारण, भिन्न-भिन्न पुरुषों के चित्त में सुख, दुःख, मोह, उदासीनता का कारण बनती है। अब इस स्थिति में इस स्त्री को किस पुरुष के चित्त से कल्पित माना जाये ?
अगर वह स्त्री किसी एक पुरुष के चित्त द्वारा कल्पित है, तो उस कल्पित स्त्री का किसी अन्य पुरुष के चित्त के साथ सम्बन्ध किस प्रकार से युक्त होगा ? अर्थात् कोई पुरुष अपने चित्त द्वारा सुखोत्पादक किसी वस्तु को कल्पित करे, और दूसरा पुरुष, उस पहले पुरुष द्वारा कल्पित वस्तु से सम्बन्ध बनाता हुआ रागयुक्त अथवा द्वेषयुक्त हो जावे, ऐसा कैसे सम्भव होगा ? अतः पदार्थ और ज्ञान के भिन्न-भिन्न होने से वस्तु की स्वतन्त्र सत्ता होती है, ऐसा मानना ही युक्तियुक्त है। दोनों के एक होने की किसी प्रकार की सम्भावना ही नहीं है।
क्षणिकवादी जब यह कहते हैं कि जिस प्रकार चित्त में सुख-दुःखादि की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार पदार्थ भी, भोग्य होने के कारण, ज्ञान के साथ उत्पन्न होता है। ऐसी मान्यता होने से, चित्त में उस पदार्थ विषयक ज्ञान उत्पन्न = उपस्थित होने के काल में ही पदार्थ की सत्ता माननी होगी, उस ज्ञान के उत्पन्न होने से पूर्व भी पदार्थ का अस्तित्व सिद्ध नहीं होगा, और चित्त में ज्ञान के न होने पर पदार्थ का भी विनाश मानना होगा। अर्थात् जिस चित्त के द्वारा वह पदार्थ कल्पित है, उस चित्त के लिए वह पदार्थ उसी समय उत्पन्न होगा और उस चित्त के अन्य विषय में लगने से, पूर्व क्षण में कल्पित पदार्थ की सत्ता समाप्त हो जानी चाहिए। परन्तु उस पदार्थ की सत्ता बनी रहने से, उस पदार्थ के अन्य पुरुषों को भी उपलब्ध होते रहने से, पदार्थ को चित्त की परिकल्पना मानना, तर्क एवं प्रमाण से सर्वथा विरुद्ध जानना चाहिए।
जैसा कि पूर्व सूत्र में वस्तु को सत्त्वादि तीन गुणों का परिणाम कहा है, और गुणों का स्वभाव चञ्चल कहा गया है। अतः सत्त्वादि गुणों के प्रभाव से विभिन्न वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, और सत्त्व गुण की प्रधानता से चित्त में सुख, रजोगुण की प्रधानता से चित्त में दुःख तथा तमोगुण की प्रधानता से चित्त में मूढता उत्पन्न होती है। इसी को उदाहरण द्वारा भोज ने इस प्रकार से कहा है — स्त्री के समीप होने पर कामुक पुरुष = पति का चित्त सहकारी कारण धर्म की प्रबलता से, सत्त्वगुण की प्रधानता से, परिणाम को प्राप्त होता हुआ सुखमय = सुखरूप होता है; सहकारी कारण अधर्म की प्रबलता से सपत्नी = सौत का चित्त, रजोगुण की प्रधानता से, परिणाम को प्राप्त होता हुआ दुःखरूप होता है; तीव्र अधर्म की अधिकता से, तमोगुण की प्रधानता से, कोप करने वाली सपत्नी = सौत का चित्त परिणाम को प्राप्त होता हुआ, मोह = मूढता को प्राप्त हो जाता है।
अतः पदार्थ को ज्ञान की परिकल्पना मानना सिद्धान्तविरुद्ध है। इस विषय में भोज द्वारा दिये गए अन्य तर्कों का स्पष्टीकरण अगले सूत्र की व्याख्या में किया जायेगा। अगले सूत्र पर भोजवृत्ति उपलब्ध नहीं होती। वस्तुतः इन दो सूत्रों पर व्यासभाष्य और इस सूत्र पर भोजवृत्ति की समानता को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि, वर्त्तमान काल में सूत्र ४.१६ के रूप में स्वीकृत प्रश्नात्मक सूत्र “न चैकचित्ततन्त्रं ....... ” इसी सूत्र पर व्यासभाष्य की व्याख्या का ही भाग है, जो बाद में प्रतिलिपिकारों द्वारा अलग से लिखा जाता हुआ, मूल सूत्र के रूप से प्रचलित हो गया। यह कार्य भोज के काल के बाद ही हुआ होगा। इस विषय पर भोज द्वारा दिए गए अन्य तर्क, अगले सूत्र पर दिए गए महर्षि व्यास के तर्कों के समान होने से, यह धारणा उचित प्रतीत होती है। और फिर महर्षि पतञ्जलि की शैली भी प्रश्नात्मक नहीं है। इस प्रकार से उठाये गये प्रश्न का उत्तर भी अगले सूत्र में नहीं मिलता। “किं स्यात्” जैसी भाषा का प्रयोग महर्षि व्यास ने तो इस भाष्य में पहले भी किया है। ऐसे में यह अधिक उचित प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास ने ही प्रश्न उठाकर आगे उसका समाधान किया था।