Donation Appeal Download Our App
Kaivalya Paada / Salvation / 3
Choose Sutra
Kaivalya Paada / Salvation / 3

निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्॥३॥

Padas Name : Kaivalya Paada / Salvation | Sutra No : 3

In Hindi:

पदपाठ : निमित्तम् अप्रयोजकम् प्रकृतीनाम् वरणभेदः तु ततः क्षेत्रिकवत्॥

हिंदी में अर्थ : (निमित्तम्) धर्म-अधर्म आदि निमित्त (प्रकृतीनाम्) शरीर और इन्द्रियों की प्रकृतियों के (अप्रयोजकम्) प्रयोजक = प्रेरक नहीं हैं, (तु) किन्तु (ततः) उन धर्म-अधर्म आदि निमित्तों से (क्षेत्रिकवत्) खेतिहर किसान के कार्य के समान, (वरणभेदः) प्रतिबन्धक का निवारण होता है॥

व्यास भाष्य : न हि धर्मादि निमित्तं तत्प्रयोजकं प्रकृतीनां भवति। न कार्येण कारणं प्रवर्त्तत इति। कथं तर्हि, वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्। यथा क्षेत्रिकः केदारादपां पूर्णात्केदारान्तरं पिप्लावयिषुः समं निम्नं निम्नतरं वा नापः पाणिनापकर्षत्यावरणं त्वासां भिनत्ति, तस्मिन्भिन्ने स्वयमेवापः केदारान्तरमाप्लावयन्ति तथा धर्मः प्रकृतीनामावरणमधर्मं भिनत्ति, तस्मिन्भिन्ने स्वयमेव प्रकृतयः स्वं स्वं विकारमाप्लावयन्ति। यथा वा स एव क्षेत्रिकस्तस्मिन्नेव केदारे न प्रभवत्यौदकान्भौमान्वा रसान्धान्यमूलान्यनुप्रवेशयितुम् किं तर्हि? मुद्गगवेधुकश्यामाकादींस्ततोऽपकर्षति। अपकृष्टेषु तेषु स्वयमेव रसा धान्यमूलान्यनुप्रविशन्ति। तथा धर्मो निवृत्तिमात्रे कारणमधर्मस्य। शुद्ध्यशुद्ध्योरत्यन्तविरोधात्। न तु प्रकृतिप्रवृत्तौ धर्मो हेतुर्भवतीति। अत्र नन्दीश्वरादय उदाहार्याः। विपर्ययेणाप्यधर्मो धर्मं बाधते। ततश्चाशुद्धिपरिणाम इति। अत्रापि नहुषाजगरादय उदाहार्याः॥

हिंदी में अर्थ : (तत्) वह (धर्मादि निमित्तम्) धर्म-अधर्म आदि निमित्त (प्रकृतीनाम्) शरीर और इन्द्रियों की प्रकृतियों के (प्रयोजकम्) प्रयोजक = प्रेरक (न हि भवति) नहीं होते। क्योंकि (कार्येण) कार्य के द्वारा (कारणम्) कारण (न प्रवर्तते इति) प्रवृत्त नहीं होता। (कथम् तर्हि) तो जात्यन्तर परिणाम कैसे होता है ? (ततः) उस धर्म आदि निमित्त से, (क्षेत्रिकवत्) किसान के समान, (वरणभेदः तु) प्रकृतियों के प्रतिबन्धक का निवारण = भेदन मात्र होता है।

(यथा) जिस प्रकार (क्षेत्रिकः) किसान (अपाम् पूर्णात्) जल से पूर्ण (केदारात्) खेत की एक क्यारी से (समम् निम्नम् निम्नतरम् वा केदारान्तरम्) दूसरी समतल, निम्न वा अधिक नीची क्यारी में (पिप्लावयिषुः) जल पहुँचाने का इच्छुक होने पर, (अपः) जल को (पाणिना) अपने हाथ से (न अपकर्षति) नहीं पहुँचाता = खींचता; (तु) किन्तु (आसाम्) उस जल के (आवरणम्) आवरण = मेड़ को (भिनत्ति) तोड़ देता है। (तस्मिन् भिन्ने) उस मेड़ के टूट जाने पर (आपः) जल (स्वयम् एव) स्वयं ही (केदारान्तरम्) दूसरी क्यारी में (आप्लावयन्ति) पहुँच जाता है; (तथा) उसी प्रकार (धर्मः) धर्म भी (प्रकृतीनाम्) प्रकृतियों के (आवरणम् अधर्मम्) प्रतिबन्धक = आवरण अधर्म को (भिनत्ति) निवृत्त करता है। (तस्मिन् भिन्ने) उस आवरण रूप अधर्म के निवृत्त हो जाने पर (प्रकृतयः) शरीर और इन्द्रियों की प्रकृतियाँ (स्वयम् एव) स्वयं ही (स्वम् स्वम् विकारम्) अपने-अपने विकार को (आप्लावयन्ति) प्राप्त हो जाती हैं।

(वा) अथवा (यथा) जिस प्रकार (स एव) वही (क्षेत्रिकः) किसान (तस्मिन् एव केदारे) उसी क्यारी में (औदकान् भौमान् वा रसान्) जलीय वा पार्थिव रसों को (धान्यमूलानि) धान = अन्न के पौधों की जड़ों में (अनुप्रवेशयितुम्) प्रविष्ट कराने में (न प्रभवति) स्वयं समर्थ नहीं होता। (किम् तर्हि) तो कैसे होता है ? (ततः) उस क्यारी से (मुद्गगवेधुकश्यामाकादीन्) मुद्ग, गवेधक और श्यामक आदि घासों को (अपकर्षति) खोदकर हटा देता है; (तेषु अपकृष्टेषु) उन घासों के हट जाने पर (रसाः स्वयम् एव) जलीय और पार्थिव रस स्वयं ही (धान्यमूलानि) अन्न के पौधों की जड़ों में (अनुप्रविशन्ति) प्रविष्ट हो जाते हैं। (तथा) उसी प्रकार (धर्मः) धर्म भी (अधर्मस्य) अधर्म की (निवृत्तिमात्रे) निवृत्ति मात्र में (कारणम्) कारण बनता है; इसमें कारण है कि — (शुद्ध्यशुद्ध्योः) शुद्धि और अशुद्धि का परस्पर (अत्यन्तविरोधात्) अत्यन्त विरोध होने से। (धर्मः) धर्म (प्रकृतिप्रवृत्तौ) प्रकृति की प्रवृत्ति में (हेतुः) कारण (न तु भवति इति) नहीं होता। (अत्र) इस विषय में (नन्दीश्वरादयः) नन्दीश्वर आदि के (उदाहार्याः) उदाहरण देने योग्य हैं। (विपर्ययेण) इस से विपरीत (अधर्मः) अधर्म (अपि) भी (धर्मम्) धर्म को (बाधते) बाधित करता है, (च) और (ततः) उससे (अशुद्धिपरिणामः इति) अशुद्धि वाले परिणाम होते हैं। (अत्र) इस विषय में (अपि) भी (नहुषाजगरादयः) नहुष अजगर आदि (उदाहार्याः) उदाहरण देने योग्य हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : जात्यन्तर परिणाम किस प्रकार से होता है, इसे पिछले सूत्र में स्पष्ट करते हुए कहा है — शरीर और इन्द्रियों हेतु “प्रकृत्यापूरात्” अर्थात् प्रकृति = महाभूतों और अंहकार के अवयवों के प्रवेश करने से होता है। परन्तु यह जात्यन्तर परिणाम स्वतन्त्र रूप से न होकर धर्म-अधर्म आदि निमित्तों की अपेक्षा से होता है, ऐसी ईश्वरीय व्यवस्था है। इसकी विशेष व्याख्या पिछले सूत्र में कर दी है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि प्रकृति के अवयवों का, शरीर और इन्द्रियों के निर्माण हेतु, होने वाले आपूर = प्रवेश में धर्म-अधर्म निमित्तों की अपेक्षा तो होती है, परन्तु ये निमित्त प्रत्यक्ष रूप से = सीधे रूप से इसमें प्रेरक नहीं होते अर्थात् इन धर्म-अधर्म निमित्तों से प्रेरित होकर महाभूत और अहंकार, पुरुष = आत्मा हेतु शरीर और इन्द्रियों के निर्माण में संलग्न नहीं होते।

धर्म-अधर्म आदि निमित्त प्रकृति के अवयवों के प्रेरक = प्रयोजक क्यों नहीं होते ? इसका उत्तर देते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि कार्य के द्वारा कारण प्रवृत्त नहीं होता। इसका तात्पर्य यह है कि धर्म-अधर्म रूप निमित्त, प्रकृति के उपरोक्त अवयवों की अपेक्षा से कार्य हैं !!! अर्थात् शरीर और इन्द्रियों की प्रकृतियाँ, जो कि महाभूत और अहंकार कही गयी हैं, वे धर्म-अधर्म के कारण हैं। जबकि शास्त्रानुसार धर्म-अधर्म का सम्पादन करने वाला पुरुष होता है, जो कि स्वतन्त्र कर्त्ता कहा गया है, और वही उनके फलों = जाति, आयु और भोग को प्राप्त करने वाला होता है। ऐसे में शरीर और इन्द्रियों की प्रकृतियों को, धर्म-अधर्म रूप निमित्तों का कारण कहने का यही अभिप्राय है कि पुरुष को शरीर और इन्द्रियों की प्राप्ति होने पर ही वह धर्म-अधर्म का सम्पादन करने में समर्थ होता है, न कि उससे पूर्व। अतः इसी अभिप्राय से धर्म-अधर्म को इन का कार्य कहा गया है।

जीवात्मा के लिए कर्मानुसार अन्य जाति हेतु शरीर और इन्द्रियों के निर्माण में धर्म-अधर्म निमित्त किस प्रकार से कार्य करते हैं ? इसको स्पष्ट करते हुए सूत्रकार महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि ये धर्म-अधर्म रूप निमित्त, किसान के समान, इन प्रकृतियों के आवरण = प्रतिबन्धकों को दूर कर देते हैं। अर्थात् जैसे किसान खेत की एक क्यारी से दूसरी क्यारी में जल ले जाने की इच्छा करता हुआ, जल से भरी क्यारी के आवरण = मेड़ को तोड़ देता है, जिससे उस क्यारी का जल दूसरी समतल अथवा निचली क्यारी में स्वतः चला जाता है। यहाँ किसान जल पर कोई प्रत्यक्ष क्रिया नहीं करता, मात्र परोक्ष रूप से आवरण को तोड़ कर, जल के लिये दूसरी क्यारी में जाने का मार्ग खोल देता है और जल स्वयं ही वहाँ पहुँच जाता है। इसी किसान के कार्य का एक और उदाहरण दिया है कि जैसे वह धान की जड़ों में जल और पृथिवी के रसों को सीधा नहीं पहुँचाता, किन्तु वह उन पौधों के साथ स्थित मुद्ग, श्यामक आदि घासों को उखाड़ कर दूर कर देता है जिससे जलीय और पार्थिव रस उन धान के पौधों की जड़ों में स्वतः पहुँच जाते हैं।

इसी प्रकार धर्म-अधर्म रूप निमित्त भी अपने कार्य को करते हैं। ये दोनों ही एक-दूसरे से सर्वथा विपरीत हैं। धर्म के सम्पादन से अधर्म का आवरण दूर होता है, जैसे कि नन्दीश्वर द्वारा धर्म के सम्पादन से उसके अधर्म के संस्कार क्षीण = नष्ट होने से उसे देवत्व की प्राप्ति हुई। इस उदाहरण में नन्दीश्वर के धर्मपालन से, देवत्व की प्राप्ति हेतु, उसके अधर्म रूपी आवरण का नाश होना कहा है। इसी प्रकार अधर्म के परिपालन से धर्म का बाध होता है, और उसके अशुद्धि वाले परिणाम होते हैं, इसके उदाहरण नहुष और अजगर आदि हैं। नहुष जो देवों के राजा इन्द्र की पदवी पर था, वह अपने अधर्म पालन से देवत्व परिणाम को छोड़कर निकृष्ट परिणाम को प्राप्त करता है। इस उदाहरण में नहुष द्वारा अधर्म के परिपालन से, निकृष्ट परिणाम की प्राप्ति हेतु, उसका पूर्वकृत धर्म का आवरण नष्ट हो गया।

वस्तुतः इन दोनों उदाहरणों का अभिप्राय है कि जैसे वर्त्तमान जीवन में मनुष्य द्वारा धर्म का पालन, उसके अधर्म के आवरण को क्षीण = नष्ट कर, उसे श्रेष्ठ बनाता है; इसी प्रकार से अधर्म का परिपालन भी, उसके पूर्वकृत धर्म के आवरण को नष्ट कर, उसे निकृष्ट = कुटिल बनाता है; उसी प्रकार से ये धर्म-अधर्म रूप निमित्त अपने विरोधी आवरण को भेदने से, पुरुष के लिए कर्मानुसार जात्यन्तर परिणाम हेतु शरीर और इन्द्रियों के निर्माण में इनकी प्रकृतियों के अवयवों = महाभूतों तथा अंहकार के अनुप्रवेश को समर्थ करते हैं।

इन दोनों उदाहरणों को जात्यन्तर परिणाम के सन्दर्भ में देखकर आधुनिक भाष्यकारों ने वर्त्तमान जन्म में ही जात्यन्तर परिणाम को माना है। परन्तु यह भ्रान्ति व्यास भाष्य को न समझने के कारण हुई है। देखो, इस सन्दर्भ में योगसूत्र २.१२ के भाष्य में महर्षि व्यास लिखते हैं — “यथा नन्दीश्वरः कुमारो मनुष्यपरिणामं हित्वा देवत्वेन परिणतः। तथा नहुषोऽपि देवानामिन्द्रः स्वकं परिणामं हित्वा तिर्यक्त्वेन परिणत इति।” अर्थात् नन्दीश्वर कुमार अपने पुण्य कर्माशय के प्रभाव से मनुष्य परिणाम को छोड़कर देव परिणाम को प्राप्त हुआ। तथा देवों का राजा नहुष भी अपने पाप कर्माशय के कारण अपने देव परिणाम को छोड़कर नीच = कुटिल परिणाम को प्राप्त हुआ। यहाँ प्रश्न होता है “तो क्या ये दोनों परिणाम जात्यान्तर परिणाम नहीं थे ?” इसके उत्तर में योगसूत्र २.१३ में महर्षि व्यास का निम्न वचन है — “दृष्टजन्मवेदनीयस्त्वेकविपाकारम्भी भोगहेतुत्वात् द्विविपाकारम्भी वा भोगायुर्हेतुत्वान्नन्दीश्वर-वन्नहुषवद्वेति।” अर्थात् वर्त्तमान जन्म में फल देने वाला कर्माशय तो भोग का हेतु होने से एक फल को देने वाला होता है; अथवा भोग और आयु का हेतु होने से दो फलों को देने वाला होता है, जैसे कि नन्दीश्वर के समान अथवा नहुष के समान। अतः इस विवरण से स्पष्ट है कि नन्दीश्वर और नहुष के लिए वर्त्तमान जन्म में हुए परिणाम, श्रेष्ठता और निष्कृटता प्राप्ति रूपी परिणाम थे, जो कि जात्यन्तर परिणाम कदापि नहीं थे।

अतः जिस प्रकार धर्म-अधर्म का परिपालन यथाक्रम अधर्म और धर्म के आवरण को वर्त्तमान जन्म में ही नष्ट कर, मनुष्य को श्रेष्ठ अथवा निकृष्ट बनाता है; उसी प्रकार ये निमित्त जात्यन्तर परिणाम हेतु भी अपने विरोधी आवरण को दूर करने वाले होते हैं। इस प्रकार से अपने विरोधी आवरण के दूर होने से, अन्य जाति परिणाम हेतु शरीर और इन्द्रिय निर्माण पर किस प्रकार का प्रभाव होता है, इस पर वेदानुकूल सत्यशास्त्रों में विशेष रूप से कुछ उपलब्ध नहीं होता। परन्तु सामान्य रूप से इसको इस प्रकार से समझा जा सकता है — जात्यन्तर परिणाम में होने वाले शरीर और इन्द्रियों के निर्माण हेतु धर्म-अधर्म निमित्तों द्वारा अपने विरोधी यथाक्रम अधर्म-धर्म रूप आवरणों के भेदन से होने वाले परिणाम को, निर्मित होने वाले शरीर और इन्द्रियों की उत्कृष्टता, मध्यमता, निष्कृष्टता, पूर्णांगता, अल्पांगता आदि के रूप में जाना जा सकता है। अर्थात् पुरुष द्वारा संचित धर्म-अधर्म आदि के प्रभाव से दूसरी जाति = दूसरे जन्म में मिलने वाले शरीर और इन्द्रियाँ उत्कृष्ट स्तर के अथवा मध्यम = सामान्य स्तर के अथवा निम्न / निष्कृष्ट स्तर के होंगे; इसी प्रकार स्थूलशरीर, सभी अंगों से पूर्ण अथवा अल्प अंगों वाला अथवा विकृत अंगों वाला होगा अर्थात् पूर्ण सामर्थ्य वाला, मध्यम = सामान्य सामर्थ्य वाला अथवा अल्प सामर्थ्य वाला होगा; तथा इन्द्रियों की विषय ग्रहण की क्षमता उत्कृष्ट स्तर की होगी अथवा मध्यम स्तर की होगी अथवा निम्न स्तर की होगी। देखो, विभिन्न पशु-पक्षियों में एक-दो इन्दियाँ ही विशिष्ट योग्यता वाली होती है, जबकि अन्य नहीं। इस व्यवस्था का विशिष्ट ज्ञान तो परमात्मा को ही है।

अतः पुरुष स्वयं ही धर्म-अधर्म आदि द्वारा अपने हेतु जाति = जन्म परिणाम को करता; प्राप्त जन्म में औषधि सेवन से शरीर का निर्माण भी कर सकता; इसी प्रकार मन्त्र अर्थात् विचार — वेदादि सत्यशास्त्रों में कहे नियमों के परिपालन से उपलब्ध शरीर की योग्याताओं को बढ़ा सकता अथवा विपरीत आचरण से इस शरीर को क्षीण = नष्ट भी कर सकता; तप के अनुष्ठान से भी शरीर को उत्कृष्ट बनाता; और समाधि = धारणा- ध्यान-समाधि द्वारा पृथक् प्रकार से शरीर निर्माण में समर्थ होता है। योगी इन पाँच प्रकारों से स्थूलशरीर निर्माण में समर्थ होता है। इन पाँच प्रकार से निर्मित शरीरों में चित्त = ज्ञान का स्तर भी पाँच प्रकार से निर्मित होता है। यह पाँच प्रकार से निर्माणचित्त कैसे होता है ? इसको अगले सूत्र में स्पष्ट कर रहे हैं।