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Kaivalya Paada / Salvation / 6
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Kaivalya Paada / Salvation / 6

तत्र ध्यानजमनाशयम्॥६॥

Padas Name : Kaivalya Paada / Salvation | Sutra No : 6

In Hindi:

पदपाठ : तत्र ध्यानजम् अनाशयम्॥

हिंदी में अर्थ : (तत्र) उन पाँच प्रकार के निर्माणचित्तों में से (ध्यानजम्) ध्यान = समाधि से उत्कृष्ट स्तर का बना हुआ चित्त (अनाशयम्) आशय = वासना रहित होता है॥

व्यास भाष्य : पञ्चविधं निर्माणचित्तं जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धय इति। तत्र यदेव ध्यानजं चित्तं तदेवानाशयम्। तस्यैव नास्त्याशयो रागादिप्रवृत्तिः। नातः पुण्यपापाभिसम्बन्धः क्षीणक्लेशत्वाद्योगिन इति। इतरेषां तु विद्यते कर्माशयः॥

हिंदी में अर्थ : (पञ्चविधम्) पाँच प्रकार का (निर्माणचित्तम्) निर्माणचित्त होता है, क्योंकि (जन्मौषधिमन्त्रतपः- समाधिजाः) जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि जन्य पाँच प्रकार की (सिद्धयः इति) सिद्धियाँ होती हैं। (तत्र) उन पाँच प्रकार के निर्माणचित्तों में (यत् एव) जो (ध्यानजम् चित्तम्) ध्यान = समाधि से सम्पन्न = सिद्ध चित्त है, (तत् एव) वह ही (अनाशयम्) आशय = वासनाओं से रहित होता है। (तस्य एव) उस समाधि से सिद्ध = सम्पन्न हुए निर्माणचित्त में ही (रागादिप्रवृत्तिः) राग आदि की प्रवृत्ति करने वाली (आशयः) वासनायें (न अस्ति) नहीं होती। (अतः) इस लिए (पुण्यपापाभिसम्बन्धः) पुण्य और पाप का सम्बन्ध (न) उसको नहीं होता, क्योंकि (योगिनः) योगी के (क्षीणक्लेशत्वात् इति) अविद्या आदि क्लेश क्षीण हो जाते हैं। (इतरेषाम् तु) अन्य प्रकार से सम्पन्न हुए चित्तों में तो (कर्माशयः) कर्माशय और उससे जन्य संस्कार (विद्यते) विद्यमान रहते हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : योगी पुरुष पाँच प्रकार से निर्माणचित्त को अर्थात् चित्त के पाँच प्रकार के स्तरों को बनाने में समर्थ होता है। इस तथ्य का प्रतिपादन महर्षि व्यास इस सूत्र के भाष्य में स्पष्ट रूप से कर रहे हैं। अर्थात् जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि जन्य पाँच प्रकार की सिद्धियों से योगी पुरुष पाँच प्रकार से शरीर की उत्कृष्ट स्थितियों का निर्माण करता है, उसी प्रकार चित्त के स्तरों का भी पाँच प्रकार से निर्माण करने में समर्थ होता है। इन पाँच प्रकार के चित्त के स्तरों में समाधि द्वारा सम्पन्न = संस्कृत हुआ चित्त, राग आदि जन्य वासनाओं से रहित होता है। पुरुष के चित्त में शुभ-अशुभ-मिश्रित कर्मों, और उन कर्मों के फलों के भोग से वैसी ही वासनायें बनती हैं, जो संस्कार रूप से पुरुष के चित्त में संचित होती हैं, और इन्हीं वासनाओं = संस्कारों के कारण ही पुरुष जन्म-मरण के अनवरत चक्र में लगा हुआ है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि योगी धर्ममेघसमाधि द्वारा क्लेश और कर्मों को निवृत्त करने में , तथा असम्प्रज्ञात समाधि द्वारा उन संस्कारों = वासनाओं को नष्ट करने में समर्थ हो जाता है और वर्त्तमान के जीवन्मुक्त योगी द्वारा किये जाने वाले अशुक्ल-अकृष्ण कर्म उसके लिए बन्धन का कारण नहीं बनते। अतः योगी जब अविद्यादि क्लेशों को नष्ट कर देता है, तो ऐसे क्षीण क्लेशों वाले योगी के कर्म पुण्य-पाप से रहित होने से उसके चित्त में वासनायें नहीं बनती। अर्थात् योगी के चित्त में अविद्या रूप क्लेश के नष्ट होने पर राग-द्वेष रूपी दोषों की प्रवृत्ति न रहने से उसका पाप-पुण्य से सम्बन्ध नहीं होता, अतः उसका चित्त आशय = वासना रहित कहा गया है। यह चित्त की सर्वश्रेष्ठ अवस्था कही गई है, क्योंकि इसी अवस्था में चित्त पुरुष के समान पवित्र होकर रहता है।

जबकि अन्य प्रकार के निर्माणचित्तों में = चित्त के अन्य स्तरों में अविद्यादि क्लेशों का नाश न होने से, रागादि दोषों की प्रवृत्ति रहती है और पुरुष पाप, पुण्य और मिश्रित तीनों प्रकार के कर्मों को करता हुआ चित्त में वासनाओं = संस्कारों का संचय करता रहता है। अतः शेष चारों प्रकार के निर्माणचित्त वासनाओं से युक्त होते हैं॥