In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : ३६. वन्यपशुप्रकरणम्
१ वने रात्रौ सिंहाः गर्जन्ति। वन में रात के समय सिंह गर्जते हैं।
२ शार्दूलं दृष्ट्वा सिंहाः निलीयन्ते। शार्दूल को देखकर सिंह छिप जाते हैं।
३ ह्यः सहेन गौर्हता। कल सिंह ने गौ को मार डाला।
४ परश्वो विक्रमवर्मणा सिंहो हतः। परसों विक्रम क्षत्रिय ने सिंह को मारा।
५ द्रष्टव्यं! हस्तिसिंहयो रणम्। देखिये! हाथी और सिंह की लड़ाई।
६ जङ्गले हस्तिसमुदाया विचरन्ति। जंगल में हाथियों के झुण्ड घूमते हैं।
७ इदानीमेव वृकेण मृगो गृहीतः। अभी भेड़िया ने हिरन को पकड़ लिया।
८ अयं कुक्कुरो बलवाननेन सिंहेन सहाप्याजिः कृता। यह कुत्ता बड़ा बलवान् है, इसने सिंह के साथ भी लड़ाई की।
९ पश्य! सिंहवराहयोः संग्रामम्। देख! सह और सूवर का युद्ध।
१० शूकरा इक्षुक्षेत्राणि भक्षित्वा विनाशयन्ति। शूकर ऊख के खेतों को खाकर नष्ट कर देते हैं।
११ पश्य! वेगेन धावतो मृगान्। देख! वेग से दौड़ते हुए हिरनों को।
१२ अयं रुरुर्वृषभवत्स्थूलोऽस्ति। यह काला रोझ बैल के समान मोटा है।
१३ यो निलीयोत्प्लुत्य धावति स शशस्त्वया दृष्टो न वा? जो छिप कर कूद के दौड़ता है, वह शशा तूने देखा है वा नहीं?
१४ बहून् दृष्टवान्। बहुतों को देखा है।
१५ कदाचिद्भालवोऽपि दृष्टा न वा? कभी भालुओं को भी देखा है वा नहीं?
१६ एकदर्क्षेन साकं मम युद्धं जातम्। एक समय रीछ के साथ मेरी लड़ाई हुई थी।
१७ रात्रौ शृगाला क्रोशन्ति। रात में सियार रोते हैं।
१८ कदाचित्खड्गोऽपि दृष्टो न वा? कभी गैंडा भी देखा वा नहीं?
१९ य आरण्या महिषा बलवन्तो भवन्ति तान्कदाचिद् दृष्टवान्न वा? जो बनैले भैंसे बड़े बलवान् होते हैं, उनको देखा वा नहीं?