In Hindi:
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : मूल स्तुति
महर्षि दयानन्द व्याख्या : व्याख्यान—हे व्यापकेश्वर! आप विभु हो, सर्वत्र प्रकाशित वैभव ऐश्वर्ययुक्त आप ही हो और कोई नहीं। विभु होके सब जगत् के प्रवाहण (स्वस्व-नियमपूर्वक चलानेवाले)तथा सबके निवार्हकारक भी आप हो। हे स्वप्रकाशक सर्वरसवाहकेश्वर! आप वह्नि हैं। सब हव्य=उत्कृष्ट रसों के भेदक, आकर्षक तथा यथावत् स्थापक आप ही हो। हे आत्मन्! आप “श्वात्रः” शीघ्र व्यापनशील हो तथा प्रकृष्ट ज्ञानस्वरूप, प्रकृष्ट ज्ञान के देनेवाले हो। हे सर्ववित् आप “तुथ” और “विश्ववेदा” हो, “तुथो वै ब्रह्म”१ (यह शतपथ की श्रुति है)सब जगत् में विद्यमान, प्राप्त और लाभ करानेवाले हो॥१६॥