स॒मु॒द्रो᳖ऽसि वि॒श्वव्य॑चाः। अ॒जो᳕ऽस्येक॑पा॒त्। अहि॑रसि बु॒ध्न्यः। वाग॑-स्यै॒न्द्रम॑सि॒ सदो॑ऽसि। ऋत॑स्य द्वारौ॑ मा मा॒ सन्ता॑प्तम्। अध्व॑नामध्वपते॒ प्र मा॑ तिर स्व॒स्ति मे॒ऽस्मिन् प॒थि दे॑व॒याने॑ भूयात्॥ १८॥ यजु॰ ५ ३३॥
In Hindi:
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : मूल स्तुति
महर्षि दयानन्द व्याख्या : “समुद्रोऽसि विश्वव्यचाः” हे द्रवणीय-स्वरूप! सब भूतमात्र आप ही में द्रवै हैं, क्योंकि कार्य कारण में ही मिले हैं, आप सबके कारण हो तथा (व्याज)=सहज से सब जगत् को विस्तृत किया है, इससे आप “विश्वव्यचाः” हैं “अजोऽस्येकपात्” आपका जन्म कभी नहीं होता और यह सब जगत् आपके किञ्चिन्मात्र एक देश में है। आप अनन्त हो। “अहिरसि बुध्न्यः” आपकी हीनता कभी नहीं होती तथा सब जगत् के मूलकारण और अन्तरिक्ष में भी सदा आप ही पूर्ण रहते हो “वागस्यैन्द्रमसि सदोसि” सब शास्त्र के उपदेशक, अनन्तविद्यास्वरूप होने से आप “वाक्” हो, परमैश्वर्यस्वरूप सब विद्वानों में अत्यन्त शोभायमान होने से आप “ऐन्द्र” हो। सब संसार आपमें ठहर रहा है, इससे आप “सदः” (सभा-स्वरूप)हो “ऋतस्य द्वारौ मा मा सन्ताप्तम्” सत्यविद्या और धर्म ये दोनों मोक्षस्वरूप आपकी प्राप्ति के द्वार हैं, उनको सन्तापयुक्त हम लोगों के लिए कभी मत रक्खो, किन्तु सुखस्वरूप ही खुले रक्खो, जिससे हम लोग सहज से आपको प्राप्त हों “अध्वनामित्यादि” हे अध्वपते! परमार्थ और व्यवहार मार्गों में मुझको कहीं क्लेश मत होने दे, किन्तु उन मार्गों में मुझको स्वस्ति (आनन्द)ही आपकी कृपा से रहे, किसी प्रकार का दुःख हमको न रहे॥१८॥