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समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च॥२॥

In Hindi:

पदपाठ : समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थः च॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : स हि क्रियायोग:—

भूमिका हिंदी अर्थ : (सः) वह (क्रियायोगः) क्रियायोग (हि) निश्चयरूपेण से —

हिंदी में अर्थ : (समाधिभावनार्थः) समाधि की उत्पत्ति के लिए (च) और (क्लेशतनूकरणार्थः) अविद्यादि क्लेशों को तनु = सूक्ष्म = दुर्बल करने के लिए है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : स ह्यासेव्यमानः समाधिं भावयति क्लेशांश्च प्रतनूकरोति। प्रतनूकृतान्क्लेशान्प्रसंख्यानाग्निना दग्धबीजकल्पानप्रसवधर्मिणः करिष्यतीति। तेषां तनूकरणात्पुनः क्लेशैरपरामृष्टा सत्त्वपुरुषान्यतामात्रख्यातिः सूक्ष्मा प्रज्ञा समाप्ताधिकारा प्रतिप्रसवाय कल्पिष्यत इति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (हि) निश्चयपूर्वक (सः) वह क्रियायोग (आसेव्यमानः) सम्यक् प्रकार से अनुष्ठान किया हुआ (समाधिम्) समाधि को (भावयति) उत्पन्न करता है, (च) और (क्लेशान्) क्लेशों को (प्रतनूकरोति) सूक्ष्म = दुर्बल करता है। क्रियायोग से (प्रतनूकृतात्) सूक्ष्म = दुर्बल = निर्बल बने हुए (क्लेशान्) क्लेशों को योगी पुरुष (प्रसंख्यानाग्निना) प्रंसख्यान रूप अग्नि = विवेकख्याति रूपी अग्नि से (दग्धबीजकल्पान्) दग्धबीज तुल्य = जले हुए बीज के समान अर्थात् (अप्रसवधर्मिणः) पुनः अङ्कुरोत्पत्ति = कार्योन्मुख करने में असमर्थ (करिष्यति इति) कर देता है। (तेषाम्) उन क्लेशों को (तनूकरणात्) तनु = सूक्ष्म करने से (पुनः) फिर (क्लेशैः) क्लेशों से (अपरामृष्टा) सम्पर्क रहित = सम्बन्ध रहित (सत्त्वपुरुषान्यतामात्रख्यातिः) सत्त्व = प्रकृति, पुरुष = जीवात्मा के भेद ज्ञान रूप विवेकख्याति रूप (सूक्ष्मा प्रज्ञा) सूक्ष्म प्रज्ञा = सूक्ष्मविषयों का साक्षात्कार कराने वाली प्रज्ञा = बुद्धि (समाप्ताधिकारा) समाप्तगुणाधिकार वाली कृतकृत्य होकर (प्रतिप्रसवाय) प्रविलय = अपने कारण में लीन होने में (कल्पिष्यते इति) समर्थ हो जाती है॥

वैदिक वृत्ति : तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान रूपी क्रियायोग के सम्यक् अनुष्ठान से साधक को समाधि की प्राप्ति होती, तथा उसके चित्त में अनुगत = उपस्थित अविद्यादि पाँचों क्लेश शिथिल = निर्बल हो जाते हैं।

क्लेशों को तनु = सूक्ष्म = निर्बल करने से क्या अभिप्राय है ? महर्षि व्यास योग सूत्र २.४ की व्याख्या में कहते हैं — “तनुत्वमुच्यते — प्रतिपक्षभावनोपहताः क्लेशास्तनवो भवन्ति।” अर्थात् प्रतिपक्ष = विरोधी भावना के निरन्तर सम्यक् चिन्तन से उपहत = दबे हुए = प्रताडि़त हुए क्लेश निर्बल हो जाते हैं। प्रतिपक्ष भावना को महर्षि पतञ्जलि योगसूत्र २.३४ में स्पष्ट करते हुए कहते है — यम-नियमों के विरोधी हिंसा आदि वितर्क, इक्यासी प्रकार के होते हुए, दुःख और अज्ञान रूपी अनन्त = अत्याधिक फलों को देने वाले होते हैं, इस प्रकार की विरोधी भावना प्रतिपक्ष भावना कहलाती है। जिस प्रकार यमों के वितर्कों हिंसा आदि का निरोध करने हेतु विरोधी भावना की जाती है उसी प्रकार अविद्यादि क्लेशों के निरोध करने हेतु भी प्रतिपक्ष भावना करनी चाहिए। इस अविद्या के कारण ही तो पुरुष जन्म-मरण रूपी संसारचक्र में फँसा हुआ अनन्त काल से दुःखों को प्राप्त कर रहा है। इस अविद्या का निराकरण किए बिना, विवेकख्याति को प्राप्त हुए बिना, कैवल्य की प्राप्ति असम्भव है।

इस सूत्र की व्याख्या में भोज ने भी क्लेशों को तनु = सूक्ष्म करने का अभिप्राय उनके कार्य और कारण को अविरुद्ध करना = नष्ट करना कहा है। अविद्या स्वयं अपने आगे के चारों क्लेशों = अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश का कारण है। महर्षि कणाद ने वैशेषिक दर्शन में अविद्या का कारण इन्द्रियदोष और संस्कारदोषों को कहा है। इसी प्रकार वेद विरुद्ध आचरण अर्थात् अधर्माचरण, अविद्याग्रस्त पुरुषों का संग आदि को भी अविद्या का कारण समझना चाहिए। अविद्यारूपी क्लेश का कार्य दोष तथा दोषों का कार्य शुभाशुभ कर्मों में प्रवृत्ति, उनका कार्य जन्म तथा दुःख क्रमशः महर्षि गौतम द्वारा न्यायदर्शन में कहा गया है।

और अगर अविद्या नष्ट न हुई तो ? इस पर यमाचार्य नचिकेता को उपदेश करते हुए कहते हैं —

अविद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः स्वयन्धीराः पण्डितम्मन्यमानाः।

दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथाऽन्धाः॥ कठोपनिषद् २.५॥

अर्थात् — अविद्या के बीच पड़े अज्ञानान्धकार में वर्त्तमान, हम शास्त्रज्ञ विचारशील हैं इस प्रकार अपने को पण्डित मानते हुए, उलटे मार्ग में चलने वाले विक्षिप्त = चञ्चल चित्त वाले, मोह में फंसे, अज्ञान से जिसके नेत्र नष्ट हो गये, उसके साथ चलने वाले, जैसे अन्धे नेत्रहीन चलते हैं वैसे सब ओर से चलते हैं। अतः अविद्या में स्वयं ग्रस्त हुआ या अविद्याग्रस्त का संग करने वाला, दोनों ही दुःखसागर में गिरते हैं।

क्रियायोग अर्थात् तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान से सर्वप्रथम अविद्या आदि क्लेशों को ही क्षीण = दुर्बल किया जाता है। तप अर्थात् धर्मानुष्ठान करते हुए, सत्याचरण = सत्य का मन, वाणी और शरीर से आचरण करते हुए, सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान आदि द्वन्द्वों को सहन करना है। अतः तप से साधक का लक्ष्य सत्याचरण ही हो जाने से अविद्या = विपर्ययज्ञान = मिथ्याज्ञान का क्षीण होना, स्वाभाविक रूप से सिद्ध होता है। महर्षि पतञ्जलि ने भी तप का फल अशुद्धि अर्थात् चित्तगत अविद्या आदि अशुद्धियों का नाश होना कहा है।

वेदाभ्यास, मोक्षशास्त्रों का अध्ययन तथा प्रणव आदि पवित्र मन्त्रों के जप को स्वाध्याय कहा है। अतः वेदादि सत्यशास्त्रों के सम्यक् स्वाध्याय से ईश्वर, जीव और प्रकृति विषयक यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति होने से इन विषयों के विपरीत ज्ञान = अविद्या की निवृत्ति होने लगती है।

इसी प्रकार ईश्वरप्रणिधान से साधक राग, द्वेष, लोभ, आसक्ति, अंहकार आदि दोषों से पृथक् होने लगता है। परिणामस्वरूप इन दोषों की माता अविद्या का नाश होना आरम्भ हो जाता है। जब साधक पूर्णरूपेण ईश्वरप्रणिधान को साध लेता है, तो उसके चित्त में अविद्या रूपी बीज का कोई स्थान नहीं रह पाता।

क्रियायोग के इन तीनों अंगों का सम्यक् अभ्यास करने से अविद्यादि क्लेशों के क्षीण होने के साथ-साथ साधक के चित्त में सत्त्वगुण के प्राबल्य से एकाग्रता की स्थिति बनने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप साधक को सम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति होती है। ईश्वरप्रणिधान का साक्षात् फल ही समाधिसिद्धि कहा है।

इन निर्बल = क्षीण हुए क्लेशों को आगे चलकर, साधक = योगी विवेकख्याति अर्थात् प्रकृति-पुरुष के भेदज्ञान रूपी अग्नि से दग्धबीज के समान बना देता है। ऐसी अवस्था में ये क्लेश जले हुए बीज के समान अपने कार्यों के सम्पादन अर्थात् दोषों और शुभाशुभ कर्मों की प्रवृत्ति को उत्पन्न करने में असमर्थ हो जाते हैं। इस प्रकार से इन क्लेशों के दग्धबीजभाव को प्राप्त होने से साधक को, विपर्यय = मिथ्याज्ञान के सम्पर्क से रहित, सूक्ष्म विषयों = प्रकृति, जीवात्मा और परमात्मा का साक्षात्कार कराने वाली विवेकख्याति रूप प्रज्ञा की प्राप्ति होती है। यह प्रज्ञा सत्त्व, रज और तम गुणों के अधिकार को समाप्त करती हुई अर्थात् इन गुणों को कार्योन्मुख करने में असमर्थ करती हुई, कृतकृत्य अर्थात् अपवर्ग रूपी फल को प्राप्त कराकर अपने कारण प्रकृति में लीन होने में समर्थ हो जाती है। परिणामस्वरूप पुरुष जन्म-मरण रूपी संसारचक्र से छूट कर दुःखों से सर्वथा छूट जाता है = कैवल्य को प्राप्त कर लेता है।