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अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्॥३७॥

In Hindi:

पदपाठ : अस्तेयप्रतिष्ठायाम् सर्वरत्नोपस्थानम्॥

हिंदी में अर्थ : (अस्तेयप्रतिष्ठायाम्) मन, वाणी और शरीर से अस्तेय की प्रतिष्ठा हो जाने पर (सर्वरत्नोपस्थानम्) योगी को सभी रत्नों = उत्तम पदार्थों की प्राप्ति होती है॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : (अस्तेय) अर्थात् जब मनुष्य अपने शुद्ध मन से चोरी के छोड़ देने की प्रतिज्ञा कर लेता है, जब उसको सब उत्तम पदार्थ यथा योग्य प्राप्त होने लगते हैं। और चोरी इसका नाम है कि मालिक की आज्ञा के बिना अधर्म से उसकी चीज को कपट से वा छिपाकर ले लेना। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

प्राचीन ॠषि भाष्य : सर्वदिक्स्थान्यस्योपतिष्ठन्ते रत्नानि॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (अस्य) इस अस्तेय प्रतिष्ठा वाले योगी के पास (सर्वदिक्स्थानि) सभी दिशाओं में स्थित (रत्नानि) रत्न = उत्तम पदार्थ (उपतिष्ठन्ते) उपस्थित होते हैं॥

वैदिक वृत्ति : इस सूत्र में मन, वाणी और शरीर से अस्तेय की प्रतिष्ठा होने का फल कहा है। जब योगी मन, वाणी और शरीर से सर्वथा और सर्वदा = सभी कालों में, बिना किसी प्रकार के वितर्क = अपवाद के अस्तेय का पालन करता है तब उस योगी को उत्तम पदार्थों की प्राप्ति होती है।

जब साधक चोरी का सर्वथा त्याग कर देता है, तो उसके चित्त में अधर्मपूर्वक दूसरे के पदार्थों की प्राप्ति की कामना = वासना दूर हो जाती है। सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति से लौकिक पदार्थ स्वतः ही हेय कोटि में आ जाते हैं; और ऐसी स्थिति में इन पदार्थों की, साधन रूप में, प्राप्ति हेतु किसी प्रकार के अधर्माचरण का अवसर ही नहीं रहता, वरन् वह तो प्राप्त साधनों के प्रति भी स्पृहा का भाव त्याग देता है। ऐसे योगी को अन्य पुरुषों से उसकी आवश्यकतानुसार सभी रत्नों = उत्तम पदार्थों की प्राप्ति स्वतः ही हो जाती है।

चोरी का त्याग करने से, अहिंसा की भावना ही सुदृढ़ होने से, योगी में परमात्मा के सान्निध्य से दिव्य गुणों की भी प्राप्ति हो जाती है। और यही दिव्य गुण ही उसके अमूल्य = दिव्य रत्न हैं, जो उसके चित्त में संस्कार रूप से उपस्थित हो मोक्ष प्राप्ति पर्यन्त सहायक होते हैं। लौकिक उत्तम पदार्थों एवं रत्नों का उपयोग तो साधक के लिए अधिकतम इस शरीर के रहते ही सम्भव होता है, परन्तु इस प्रकार धर्माचरण से प्राप्त शुभगुण रूपी रत्न भावी जन्मों में भी, उसको मुक्ति की प्राप्ति पर्यन्त सहायक और उपयोगी होते हैं। अतः यहाँ रत्न शब्द से उसकी दैनिक आवश्यकताओं हेतु लौकिक उत्तम पदार्थों के साथ परमात्मा के सान्निध्य से प्राप्त दिव्य गुण भी अभिप्रेत हैं॥