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अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः॥३९॥

In Hindi:

पदपाठ : अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः॥

हिंदी में अर्थ : (अपरिग्रहस्थैर्ये) मन, वाणी और शरीर से अपरिग्रह की स्थिरता हो जाने पर (जन्मकथन्तासम्बोधः) जन्म सम्बन्धी क्यों ? कैसे ? आदि विषयों का बोध हो जाता है अर्थात् जन्म की प्रकारता और कारणों का बोध = ज्ञान हो जाता है॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : (अपरिग्रहस्थै॰) अपरिग्रह का फल यह है कि जब मनुष्य विषयासक्ति से बचकर सर्वथा जितेन्द्रिय रहता है, तब मैं कौन हूँ ?, कहाँ से आया हूँ ? और मुझको क्या करना चाहिए ? अर्थात् क्या काम करने से मेरा कल्याण होगा; इत्यादि शुभगुणों का विचार उसके मन में स्थिर होता है। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

प्राचीन ॠषि भाष्य : अस्य भवति। कोऽहमासं कथमहमासं किंस्विदिदं कथंस्विदिदं के वा भविष्यामः कथं वा भविष्याम इत्येवमस्य पूर्वान्तपरान्तमध्येष्वात्मभावजिज्ञासा स्वरूपेणोपावर्त्तते। एता यमस्थैर्ये सिद्धयः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (अस्य भवति) इन शब्दों का सूत्र के साथ सम्बन्ध है। अर्थात् इस योगी को जन्मकथन्ता का बोध हो जाता है। (अहम्) मैं (कः) कौन (आसम्) था ? (अहम्) मैं (कथम्) किस प्रकार से (आसम्) था ? (इदम्) यह जन्म (किंस्वित्) क्या है ? (इदम्) यह जन्म (कथंस्वित्) कैसे हुआ है = इस जन्म का कारण क्या है ? (के वा भविष्यामः) हम अगले जन्मों में कौन होंगे ? (कथम् वा भविष्यामः इति) हम अगले जन्मों में कैसे = किस प्रकार से होंगे ? (एवम्) इस प्रकार से (अस्य) इस योगी की (पूर्वान्तपरान्तमध्येषु) पूर्वान्त = भूतकाल, परान्त = भविष्यत् काल और मध्येषु = वर्त्तमान काल के जन्मों में (आत्मभावजिज्ञासा) आत्मस्वरूप को जानने की इच्छा (स्वरूपेण) स्वतः (उपावर्त्तते) उदित हो जाती है। (एता) ये पूर्वोक्त पाँच प्रकार की (सिद्धयः) सिद्धियाँ (यमस्थैर्ये) यमों की स्थिरता होने पर हो जाती हैं॥

वैदिक वृत्ति : इस सूत्र में अपरिग्रह के पालन का फल कहा है। जो योगी मन, वाणी और शरीर से सर्वथा और सर्वदा = सभी कालों में बिना किसी प्रकार के वितर्क = अपवाद के अपरिग्रह का पालन करता है उस योगी को भूत, वर्त्तमान और भविष्यत् के जन्मों के कारणों का बोध हो जाता है।

योगी पुरुष, विषयों में अर्जन, रक्षण, क्षय, संग और हिंसादि दोषों को देखता हुआ उनके परिग्रह हेतु पुरुषार्थ का त्याग कर देता है। वह चित्त से उन भोगसाधनों के लिए परिग्रह वृत्ति को त्याग देता है, क्योंकि उसे प्रतीत होता है कि इनका परिग्रह = संचय = लोभ उसके आत्मसाक्षात्कार रूपी लक्ष्य में अत्यन्त बाधक है। अतः उन भोगसाधनों को हेय जानता हुआ, उनके विचार मात्र से पृथक् रहने का अभ्यास बनाता है। इस परिग्रह त्याग की भावना हेतु न केवल वर्त्तमान भोगसाधनों का परिग्रह, वरन् भविष्यत् में दिव्य भोगों की प्राप्ति हेतु दिव्य शरीर प्राप्ति का लोभ भी उसके लिए परिग्रह की श्रेणी में आता है। ऐसा योगी जन्म के कारणों का नाश करना चाहता हुआ, मुक्ति की कामना करता हुआ भविष्यत् में जन्म = शरीरधारण की कामना का भी त्याग कर देता है।

अब इस स्थिति वाला योगी जब अन्तर्मुखी होता है, तो वह जन्म सम्बन्धी विषयों की ही जिज्ञासा करता है। यथा — मैं पूर्व जन्म में कौन था ? उस जन्म = योनि में किस प्रकार, किस कारण से था ? वर्त्तमान जन्म में मैं क्यों हूँ, किस कारण से हूँ ? भविष्यत् में मैं क्या होऊँगा ? और किस प्रकार, किन कारणों से होऊँगा? इस प्रकार वह जन्म और उसके कारणों की जिज्ञासा करता है। वह समस्त प्रकार के भोगसाधनों से विरक्त तथा भोगों के आधार शरीर की प्रीति के राग से भी छूटा हुआ होकर, जन्म = शरीर धारण रूपी कार्य के कारणों (= शुभाशुभ कर्माशय, अविद्यादि क्लेशों और चित्तस्थ संस्कारों) का सम्यग्ज्ञान प्राप्त करता है। इस प्रकार योगी को पूर्व और भविष्यत् के जन्मों और उनके कारणों का बोध होता है। महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र ३.१८ में संस्कारों में संयम से पूर्वजाति = जन्म का ज्ञान होना कहा है। अतः अपने संस्कारों को जानता हुआ इस प्रकार जन्मकथन्ता का ज्ञान प्राप्त करता है।

ये उपरोक्त पाँचों प्रकार की सिद्धियाँ यमों के वितर्क रहित पालन से प्राप्त होती है। योगी दूसरों के प्रति व्यवहार को शुद्ध तथा निर्दोष करता हुआ, आत्मपथ का पथिक बना हुआ, आन्तरिक शुद्धि हेतु नियमों का भी परिपालन करता है। आगे आन्तरिक शुद्धि से होने वाली सिद्धियाँ कही गई हैं।