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सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च॥४१॥

In Hindi:

पदपाठ : सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : किञ्च—

भूमिका हिंदी अर्थ : (किञ्च) शौच का और भी फल कहते हैं —

हिंदी में अर्थ : (सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च) बुद्धि की शुद्धि = निर्मलता, मन की प्रसन्नता, एकाग्रता, इन्द्रियों पर जय = नियन्त्रण, और आत्मा और परमात्मा का साक्षात्कार करने की योग्यता प्राप्त होती है॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : और उसका फल यह है कि (किञ्च०) अर्थात् शौच से अन्तःकरण की शुद्धि, मन की प्रसन्नता और एकाग्रता, इन्द्रियों का जय तथा आत्मा के देखने अर्थात् जानने की योग्यता प्राप्त होती है॥ (ऋ० भू॰ उपासना॰)

प्राचीन ॠषि भाष्य : भवन्तीति वाक्यशेषः। शुचेः सत्त्वशुद्धिस्ततः सौमनस्यं तत ऐकाग्र्यं तत इन्द्रियजयस्ततश्चात्म- दर्शनयोग्यत्वं बुद्धिसत्त्वस्य भवतीत्येतच्छौचस्थैर्यादधिगम्यत इति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (भवन्ति इति वाक्यशेषः) शौच से ये सिद्धियाँ होती हैं, यह सूत्र का शेष है। (शुचेः) शौच के अनुष्ठान की दृढ़ता से (सत्त्वशुद्धिः) बुद्धि की शुद्धि होती है। (ततः) बुद्धि की शुद्धि से (सौमनस्यम्) मन की प्रसन्नता होती है। (ततः) मन की प्रसन्नता से (ऐकाग्र्यम्) मन की एकाग्रता होती है। (ततः) मन की एकाग्रता होने से (इन्द्रियजयः) इन्द्रियों पर विजय होती है। (च) और (ततः) इन्द्रियों की जय से (आत्मदर्शनयोग्यत्वम्) आत्म-साक्षात्कार की योग्यता (बुद्धिसत्त्वस्य) बुद्धिसत्त्व = चित्त को (भवति) प्राप्त होती है। (इति एतत्) इस प्रकार दो सूत्रों में कहे गए फल = सिद्धियाँ (शौचस्थैर्यात्) बाह्य और आभ्यान्तर शौच की स्थिरता से (अधिगम्यत इति) प्राप्त होते हैं॥

वैदिक वृत्ति : साधक द्वारा शौच का पालन करने से, शरीर की मलिनता का ज्ञान होने से, उसमें एकान्त रहने की भावना बलवती होती है। क्योंकि वह जानता है कि उसके शरीर के समान ही दूसरों के शरीर भी मलिन है, और इन मलिन शरीरों के सम्पर्क = संसर्ग से किसी प्रकार की उपलब्धि न होकर अविद्या ही घनीभूत होती है। अतः साधक स्वयं में निष्ठ हुआ अन्तर्मुखी होकर आन्तरिक उपलब्धियों की प्राप्ति में संलग्न हो जाता है। उसे इस प्रकार सत्त्वशुद्धि, मन की प्रसन्नता, एकाग्रता, इन्द्रियजय और आत्म-साक्षात्कार की योग्यता प्राप्त होती है।

आन्तरिक शौच का परिपालन करता हुआ साधक, जब चित्त में अविद्या के कारण होने वाले राग, द्वेष आदि दोषों को दूर कर देता है, तो ऐसे में साधक की बुद्धि रजोगुण और तमोगुण रूपी मलों के दूर हो जाने पर सत्त्वगुण बहुल हो जाती है; और इस प्रकार से बुद्धि की शुद्धि सर्वप्रथम होती है। इस प्रकार सत्त्वगुण प्रधान हुई बुद्धि के प्रभाव से साधक समाधिपाद के सूत्र ३३ में उपदिष्ट मैत्री आदि का परिपालन करता हुआ चित्त की प्रसन्नता को प्राप्त करता है। मन की प्रसन्नता को प्राप्त हुआ साधक सूत्र १.३३-३८ पर्यन्त उपदिष्ट परिकर्मों के परिपालन से ही मन की एकाग्रता को प्राप्त करता है।

अब मन की एकाग्रता को प्राप्त हुआ साधक अपनी इन्दियों को किसी एक विषय = आलम्बन में लगाता है। इस स्थिति में वह इन्द्रियों द्वारा ग्राह्य बाह्य विषयों का त्याग कर, चित्त को आन्तरिक विषयों में और मुख्यतया से अपने आत्मा में स्थिर करता है। इस प्रकार से इन्द्रियों की बाह्यविषयों से निरोध पूर्वक चित्त में स्थिरता ही इन्द्रियजय ही स्थिति कहलाती है। इन्द्रिय जय की योग्यता को प्राप्त हुआ साधक ही आत्म-साक्षात्कार के सामर्थ्य को प्राप्त कर पाता है। इन्द्रिय जय से आत्मदर्शन की योग्यता बढ़ती है, इस विषय में यमाचार्य कठोपनिषद् में कहते हैं —

कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्॥ कठो॰ ४.१॥

अर्थात् कोई धीर = ध्यानशील पुरुष चक्षु को आवृत्त कर = बाहर की ओर से हटा कर अन्दर की ओर कर (इन्द्रियजय को प्राप्त कर) मोक्ष की इच्छा करने वाला अन्तःकरण में व्याप्त परमात्मा को ध्यान दृष्टि से देखता है। यहाँ ज्ञानेन्द्रियों में प्रधान होने इन्द्रियों के उपलक्षण चक्षु को आवृत्त करने से, चक्षुादि सभी इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर नियन्त्रण करना ही अभिप्राय है, और इस प्रकार से इन्द्रियजय की स्थिति होने के उपरान्त ही परमात्मसाक्षात्कार का होना कहा है।

ये सभी सिद्धियाँ साधक को उपरोक्त क्रम से ही होती है। क्योंकि पूर्व-पूर्व की योग्यता प्राप्त होने से ही उत्तर-उत्तर की योग्यता प्राप्त होती है। उपरोक्त सिद्धियों के रहस्य को कठोपनिषद् में यमाचार्य इस प्रकार से कहते हैं —

यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः।

न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति॥१॥

यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः।

स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते॥२॥ कठो॰ ३.७-८॥

अर्थात् जो तो अज्ञानी = अविद्याग्रस्त होता है वह शरीर, मन और बुद्धि को शुद्ध = पवित्र न रखने वाला, मन के नियन्त्रण से रहित, आत्मा और परमात्मा को प्राप्त न करने से, संसारचक्र में घूमता रहता है॥१॥ और जो तो सदा शौच का पालन करने वाला, मन की प्रसन्नता और एकाग्रता वाला, वह आत्म-साक्षात्कार और परमात्म-साक्षात्कार को प्राप्त कर संसारचक्र से छूट जाता है।

अतः शौच के वितर्क रहित पूर्णतया अभ्यास से ही उपरोक्त सिद्धियों को प्राप्त करता हुआ साधक योग के परम फल कैवल्य को भी प्राप्त करने में समर्थ होता है।