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द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम्॥२३॥

In Hindi:

पदपाठ : द्रष्टृदृश्योपरक्तम् चित्तम् सर्वार्थम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अतश्चैतदभ्युपगम्यते—

भूमिका हिंदी अर्थ : (च) और (अतः) इसलिये (एतत्) यह (अभ्युपगम्यते) स्वीकार किया जाता है कि —

हिंदी में अर्थ : (द्रष्टृदृश्योपरक्तम्) द्रष्टा = जीवात्मा, और दृश्य = समस्त विषयों (= जड़ पदार्थों) से उपरक्त = सम्बद्ध (चित्तम्) चित्त (सर्वार्थम्) चेतन = द्रष्टा पुरुष और अचेतन = जड़ पदार्थों रूप सभी विषयों वाला होता है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : मनो हि मन्तव्येनार्थेनोपरक्तम्। तत्स्वयं च विषयत्वाद्विषयिणा पुरुषेणाऽऽत्मीयया वृत्त्याऽभिसम्बद्धम्। तदेतच्चित्तमेव द्रष्टृदृश्योपरक्तं विषयविषयिनिर्भासं चेतनाचेतनस्वरूपापन्नं विषयात्मकमप्यविषयात्मकमिवाचेतनं चेतनमिव स्फटिकमणिकल्पं सर्वार्थमित्युच्यते।

तदनेन चित्तसारूप्येण भ्रान्ताः केचित्तदेव चेतनमित्याहुः। अपरे चित्तमात्रमेवेदं सर्वं नास्ति खल्वयं गवादिर्घटादिश्च सकारणो लोक इति। अनुकम्पनीयास्ते। कस्मात्? अस्ति हि तेषां भ्रान्तिबीजं सर्वरूपाकारनिर्भासं चित्तमिति। समाधिप्रज्ञायां प्रज्ञेयोऽर्थः प्रतिबिम्बीभूतस्तस्याऽऽलम्बनीभूतत्वादन्यः। स चेदर्थश्चित्तमात्रं स्यात्कथं प्रज्ञयैव प्रज्ञारूपमवधार्येत? तस्मात्प्रतिबिम्बीभूतोऽर्थः प्रज्ञायां येनावधार्यते स पुरुष इति। एवं ग्रहीतृग्रहणग्राह्यस्वरूपचित्तभेदात्त्रयमप्येतज्जातितः प्रविभज्यन्ते ते सम्यग्दर्शिनस्तैरधिगतः पुरुषः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (मनः हि) मन = चित्त ही (मन्तव्येन अर्थेन) ज्ञातव्य = जानने योग्य पदार्थ से (उपरक्तम्) उपरञ्जित = सम्बद्ध हो जाता है। (च) और (तत्) वह चित्त (स्वयम्) स्वयं भी (विषयत्वात्) विषय होने से (विषयिणा पुरुषेण) विषयी = द्रष्टा पुरुष से (आत्मीयया वृत्त्या) अपनी वृत्ति द्वारा (अभिसम्बद्धम्) सम्बन्धित होता है। (तत् एतत्) इस प्रकार वह यह (चित्तम्) चित्त (एव) ही (द्रष्टृदृश्योपरक्तम्) द्रष्टा और दृश्य से उपरक्त = सम्बद्ध होता है अर्थात् (विषयविषयिनिर्भासम्) विषय = जड़ पदार्थों और विषयी = द्रष्टा पुरुष के जैसा भासित होता है, तथा (चेतनाचेतनस्वरूपापन्नम्) चेतन पुरुष = जीवात्मा और अचेतन = जड़ प्रकृति के विकारों के स्वरूप को प्राप्त होता है; (विषयात्मकम्) विषय रूप होता हुआ (अपि) भी (अविषयात्मकम् इव) अविषय = अदृश्य चेतन पुरुष के समान, और (अचेतनम्) अचेतन = जड़ होता हुआ भी (चेतनम् इव) चेतन के समान ज्ञात होता है। इस प्रकार से चित्त (स्फटिकमणिकल्पम्) स्फटिक मणि के समान (सर्वार्थम्) सभी विषयों वाला है (इति) ऐसा (उच्यते) कहा जाता है।

(तत्) इसलिये (अनेन) इस (चित्तसारूप्येण) चित्त के द्रष्टा और दृश्य के सारुप्य के कारण (भ्रान्ताः) भ्रान्त हुए (केचित्) कुछ लोग (तदेव) उस चित्त को ही (चेतनम्) चेतन पुरुष = भोक्तृशक्ति (इति आहुः) कहते हैं। (अपरे) दूसरे कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि (इदम् सर्वम्) यह सभी पदार्थ = दृश्य जगत् (चित्तमात्रम् एव) चित्तमात्र ही है, और (अयम्) यह (गवादिः घटादिः च) गौ आदि सजीव और घट आदि निर्जीव जो (सकारणः लोकः) कारण सहित लोक = संसार है वह (न अस्ति खलु) कुछ नहीं है, (इति) इस प्रकार चित्त से अतिरिक्त सभी पदार्थों का अभाव है। (ते) ऐसा मानने वाले वे लोग (अनुकम्पनीयाः) दया के पात्र हैं। (कस्मात्) क्यों दया के पात्र हैं ? (हि) क्योंकि (सर्वरूपाकारनिर्भासम्) द्रष्टा और दृश्य सभी के आकार से भासने वाला (चित्तम्) चित्त (तेषाम्) उन लोगों की (भ्रान्तिबीजम्) भ्रान्ति का बीज = कारण (अस्ति इति) है। इस भ्रान्ति को दूर करने का उपाय कहते हैं (समाधिप्रज्ञायाम्) सम्प्रज्ञात समाधि जन्य प्रज्ञा में = ऋतम्भरा प्रज्ञा में जो (प्रज्ञेयः अर्थः) ज्ञातव्य = जानने योग्य अर्थ = पदार्थ (प्रतिबिम्बीभूतः) प्रतिबिम्बित = प्रकाशित होता है, वह (तस्य) उस चित्त का (आलम्बनीभूतत्वात्) आलम्बन बनने के कारण (अन्यः) चित्त से अन्य = भिन्न है। (सः अर्थः) वह दृश्य रूप ज्ञेय पदार्थ (चेत्) यदि (चित्तमात्रम् स्यात्) चित्तमात्र ही हो तो (प्रज्ञया एव) समाधिकाल में प्रज्ञा = चित्त के द्वारा ही (प्रज्ञारूपम्) प्रज्ञारूप = चित्त का स्वरूप (कथम्) कैसे (अवधार्येत) निश्चित किया जाये? (तस्मात्) इसलिये (प्रज्ञायाम्) समाधिप्रज्ञा में (येन) जिसके द्वारा (प्रतिबिम्बीभूतः अर्थः) चित्त में प्रतिबिम्बित = प्रकाशित पदार्थ (अवधार्यते) निश्चित होता = जाना जाता है (सः) वह (पुरुषः इति) द्रष्टा = चेतनपुरुष है।

जो विद्वान् (एवम्) इस प्रकार (ग्रहीतृग्रहणग्राह्यस्वरूपचित्तभेदात्) ग्रहीता = पुरुष, ग्रहण = चित्त / बुद्धि और ग्राह्य = बाह्यविषय के रूप से चित्त के भेद होने से (एतत् त्रयम् अपि) इन तीनों पदार्थों को (जातितः) स्वभाव से (प्रविभज्यन्ते) भिन्न-भिन्न विभाजित करते हैं (ते) वे (सम्यग्दर्शिनः) सम्यग्दर्शी = यथार्थ रूप से जानने वाले हैं। (तैः) उन विद्वानों के द्वारा (पुरुषः) चेतन पुरुष = आत्मा (अधिगतः) साक्षात् किया जाता है॥

वैदिक वृत्ति : द्रष्टा पुरुष = चेतन आत्मा, चित्त से स्वरूपतः भिन्न होता हुआ भी, चित्त से सम्बन्धित होकर चित्त और चित्त द्वारा ग्राह्य विषयों का ज्ञाता होता है। वस्तुतः पुरुष को बाह्य विषयों का ज्ञान चित्त = मन रूपी प्रधान अन्तःसाधन के द्वारा ही होता है। पुरुष का नेत्रादि इन्द्रियों से सीधा सम्बन्ध नहीं होता किन्तु जब पुरुष किसी विषय को ग्रहण करने की इच्छा करता है तो वह मन से सम्बद्ध होता है; पुनः मन इन्द्रियों से और इन्द्रियाँ विषय से सम्बद्ध हो कर उसे ग्रहण करती हैं। इस प्रकार से मन, इन्द्रियों से संयुक्त होकर बाह्यविषयों को इन्द्रिय रूपी प्रणाली द्वारा ग्रहण करता है। अर्थात् इस प्रकार से मन = चित्त ज्ञातव्य विषय से उपरक्त होकर तदाकार होता है। यही चित्त स्वयं भी चेतन पुरुष का विषय होता है, अर्थात् पुरुष भी अपने विषय चित्त को और उसके विषयों = बाह्य पदार्थों को ग्रहण करने वाला होता है। यद्यपि वास्तविक ग्रहीता तो चेतन पुरुष ही है, परन्तु पुरुष की सन्निधि से चेतन सा हुआ चित्त, इन्द्रियों के माध्यम से बाह्य विषयों का ग्रहीता होता है और बाह्य विषय ग्राह्य होते हैं; और इन्द्रियाँ, इस स्थिति में बाह्य विषयों को जानने का साधन होने से ग्रहण की श्रेणी में आती हैं। जबकि चेतन पुरुष और चित्त के सम्बन्ध से देखा जाये तो पुरुष ही वास्तविक ग्रहीता होता है, और चित्त बाह्य विषयों के साथ सम्बद्ध होने और ज्ञान का साधन होने से ग्रहण कहलाता है, और बाह्य विषय घट-पट आदि पदार्थ ग्राह्य कहलाते हैं। और इसी प्रकार सम्प्रज्ञातसमाधि की अवस्था में, चित्त के ज्ञान करने के काल में, चित्त स्वयं भी पुरुष का विषय होने से ग्राह्य भी कहलाता है। अतः हम देखते हैं कि चित्त ही बाह्य विषयों और पुरुष दोनों के साथ उपराग को प्राप्त होता है। जब चित्त बाह्यविषयों से उपरक्त होकर तदाकारकारित होता है, तो वह बाह्य विषयों = घट-पट और गौ आदि जैसा ज्ञात होता है; और जब चेतन पुरुष से उपरक्त होता, तब उससे तदाकारकारित होकर उस पुरुष की समानरूपता को प्राप्त करता है।

देखो, चित्त के बाह्य विषयों और प्रकृति के सूक्ष्म विकारों के साथ तदाकारकारित होने पर, वितर्कानुगत और विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधियों में, योगी उन-उन पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है। इन दोनों समाधियों में उन-उन आलम्बनों के होने पर योगी को चित्त का वैसा ही रूप ज्ञात होता है, और यही पदार्थ के साक्षात्कार की स्थिति कहाती है। और अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में चित्त, सभी बाह्य विषयों से रहित होकर, चेतन पुरुष के साथ तदाकार होता हुआ पुरुष की समानरूपता को प्राप्त करता, जिससे योगी पुरुष = चेतनशक्ति का ज्ञान प्राप्त करता है। इस अवस्था में चित्त की पुरुषाकारकारित अवस्था का ज्ञान होता है। (चेतन पुरुष का वास्तविक ज्ञान तो असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में परमात्मा की सन्निधि से ही होता है।)

चित्त की पुरुष के साथ तदाकारकारिता के विषय में यह जानना चाहिए कि चित्त जब निर्मल होता अर्थात् रजोगुण और तमोगुण से किञ्चितमात्र भी अभिभूत न होता हुआ शुद्ध होता है, तभी वह चेतन पुरुष के साथ तदाकार हुआ ज्ञात होता है। इस अवस्था में बाह्य आलम्बनों से रहित होने से चित्त, पुरुष के आलम्बन को प्राप्त करता है। वस्तुतः तो चित्त जड़ होने से किसी भी प्रकार की चेतनता से रहित है। चित्त में उपर्युक्त प्रकार से विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य भी, पुरुष = चेतन आत्मा की सन्निधि से ही प्राप्त होता है। अतः भोज ने दो प्रकार की चेतन शक्तियों को कहा है — (१) नित्य चेतन शक्ति जो कि पुरुष है, और (२) प्रकाशित होने वाली, पुरुष की समीपता से अभिव्यञ्जित = प्रकाशित हुई चेतना वाला चित्त। जैसे चुम्बक की समीपता से लोह में गति होती है, उसी प्रकार पुरुष की समीपता से चित्त में चेतना का आभास होता है। इसी कारण चेतनवत् शक्ति को प्राप्त करने वाला चित्त, पुरुष का अन्तरंग साधन है।

अतः चित्त के द्रष्टा और दृश्य अर्थात् दोनों के समान रूप को प्राप्त हो जाने के कारण भ्रान्ति को प्राप्त हुए लोग चित्त को ही चेतनशक्ति = भोग्यशक्ति = भोक्ता कहते हैं। और कुछ लोग कहते हैं कि सभी पदार्थ = दृश्य रूप जगत् चित्तमात्र ही है — ये तथाकथित पदार्थ कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखते। चित्त ही घट-पट आदि और गौ आदि पदार्थ रूप होकर भासता है, अतः सभी पदार्थों का अभाव है। महर्षि व्यास कहते हैं कि ऐसे सभी लोग दया के पात्र हैं। क्योंकि उनकी भ्रान्ति का कारण है कि चित्त ही द्रष्टा और दृश्य = सभी पदार्थों के रूप को प्राप्त होकर वैसा ही भासता है। परन्तु इस भ्रान्ति को दूर किया जा सकता है। देखो, सम्प्रज्ञात समाधिजन्य प्रज्ञा में चित्त, जिस भी पदार्थ से आलम्बन को प्राप्त कर तदाकार होता है, वह पदार्थ चित्त से भिन्न होता है। यदि सभी पदार्थ चित्तमात्र ही हों = चित्त से कल्पित हों, तो समाधिकाल में चित्त के द्वारा उनका आलम्बन हो ही नहीं सकता, तब उनका स्वरूप कैसे जाना जा सकता है ? इसलिये ग्राह्यपदार्थ चित्त से भिन्न सिद्ध होते हैं; और जिसके द्वारा, चित्त में आलम्बन को प्राप्त हुए, बाह्य पदार्थों का ज्ञान प्राप्त किया जाता है, वह चेतन पुरुष है।

इस प्रकार से सर्वार्थ = सभी रूपों को प्राप्त करने वाला चित्त, पुरुष का प्रधान करण ही सिद्ध होता है। अतः जो विद्वान् पुरुष ग्रहीता = चेतन पुरुष, ग्रहण = चित्त और ग्राह्य = बाह्य पदार्थों को भिन्न-भिन्न जानते हैं, वे ही सम्यग्दर्शी = वास्तविक रूप से ज्ञाता होते हैं, और उन्हीं विद्वानों द्वारा ही समाधि में पुरुष का साक्षात्कार किया जाता है।

भोजवृत्ति में यत्तु अनुद्रिक्तत्वात् ......... अतस्तां बिना कथं भवितुमर्हति, तक का भाग बाद के काल का प्रक्षेप है। यह प्रकरण सूत्र से असम्बद्ध और महर्षि पतञ्जलि और वेदादि सत्यशास्त्रों के सिद्धान्तों से प्रतिकूल है। ऐसे कुछ मुख्य दोषों का वर्णन हमने भोजवृत्ति के पदार्थ के साथ टिप्पणियों में ही कर दिया है। अतः सुधी पाठक वहीं देख लेवें।