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Atharvaveda / 1 / 1 / 3

इ॒हैवाभि वि त॑नू॒भे आर्त्नी॑ इव॒ ज्यया॑। वा॒चस्पति॒र्नि य॑च्छतु॒ मय्ये॒वास्तु॒ मयि॑ श्रु॒तम् ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 1 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : वाचस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : बुद्धि की वृद्धि के लिये उपदेश।

पदपाठ : इ॒ह । ए॒व । अ॒भि । वि । त॒नु॒ । उ॒भे इति॑ । आलीं॑ इ॒वेत्यार्ली॑ऽइव । ज्यया॑ ।वा॒चः । पति॑: । नि । य॒च्छ॒तु॒ । मयि॑ । ए॒व । अ॒स्तु॒ । मयि॑ । श्रु॒तम् ॥

पदार्थ : (इह) इस के ऊपर (एव) ही (अभि) चारों ओर से (वितनु) तू अच्छे प्रकार फैल, (इव) जैसे (उभे) दोनों (आर्त्नी) धनुष कोटिएँ (ज्यया) जय के साधन, चिल्ला के साथ [तन जाती हैं]। (वाचस्पतिः) वाणी का स्वामी (नियच्छतु) नियम में रक्खे, (मयि) मुझमें [वर्त्तमान] (श्रुतम्) वेदविज्ञान (मयि) मुझमें (एव) ही (अस्तु) रहे ॥३॥"

भावार्थ : जैसे संग्राम में शूरवीर धनुष् की दोनों कोटियों को डोरी में चढ़ा कर बाण से रक्षा करता है, उसी प्रकार आदिगुरु परमेश्वर अपने कृपायुक्त दोनों हाथों को [अर्थात् अज्ञान की हानि और विज्ञान की वृद्धि को] इस मुझ ब्रह्मचारी पर फैला कर रक्षा करे और नियमपालन में दृढ़ करके परमसुखदायक ब्रह्मविद्या का दान करे और विज्ञान का पूरा स्मरण मुझमें रहे ॥३॥ भगवान् यास्क के अनुसार−निरुक्त ९।१७ (ज्या) शब्द का अर्थ जीतनेवाली यद्वा आयु घटानेवाली अथवा बाणों को छोड़नेवाली वस्तु है ॥

टिप्पणी :३−इह। अत्र, अस्योपरि, अस्मिन् ब्रह्मचारिणि, ममोपरि। अभि। अभितः सर्वतः। वितनु। तनु विस्तारे−लोट्, अकर्मकः। वितनुहि, वितन्यस्व विस्तृतो भव। उभे। ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम्। पा० १।१।११। इति प्रगृह्यम्। द्वये। आर्त्नी। आङ्+ऋ गतौ-क्तिन्, नकारोपसर्जनम्। पूर्ववत् प्रगृह्यम्, आर्त्नी, धनुष्कोटी, अटन्यौ धनुः प्रान्ते। आर्त्नी अर्तन्यौ वारण्यौ वारिषण्यौ वा निरु० ९।३९ ॥ ज्यया। ज्या जयतेर्वा जिनातेर्वा प्रजावयतीषूनिति वा निरु० ९।१७। अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति जि जये, वा, ज्या वयोहानौ णिच्−वा, जु रंहसि गतौ, णिच्−यक्। निपातनात् साधुः। यद्वा। अन्येष्वपि दृश्यते। पा० ३।२।१०१। इति ज्यु गत्याम् यद्वा, ज्या वयोहानौ, णिच्-ट। टाप्। धनुर्गुणेन, मौर्व्या। वाचः+पतिः मं० १ ॥ वाण्याः स्वामी। नि+यच्छतु। नियमतु, नियमे रक्षतु। अन्यत् सुगमं व्याख्यातं च ॥